अवधेश झा | नई दिल्ली 19 नवंबर के
दिल्ली में 10 नवंबर 2025 को हुए भीषण धमाके के बाद जिस वीडियो ने पूरे देश में एक बड़ा राजनीतिक और साम्प्रदायिक तूफ़ान खड़ा कर दिया, उसका असली स्वरूप अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है। धमाके के बाद सोशल मीडिया पर NSA अजित डोभाल का 35 सेकंड का एक क्लिप वायरल हुआ जिसमें वह कहते दिखते हैं कि 1947 से लेकर अब तक पाकिस्तान की ISI ने भारत में “मुसलमानों की तुलना में ज़्यादा हिंदुओं को खुफिया कार्यों के लिए भर्ती किया है।” इस बयान ने पूरे माहौल का ध्यान उस तथ्य की ओर मोड़ दिया जिसे अक्सर राजनीतिक विमर्श में दबा दिया जाता है—कि आतंकवाद को किसी धर्म की लेंस से परिभाषित करना वास्तविकता के विपरीत है। लेकिन वीडियो के वायरल होते ही डोभाल ने इसे “डीपफेक” बता कर खारिज कर दिया, और एक राष्ट्रीय टीवी चैनल पर कहा कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा। उनकी यह प्रतिक्रिया साम्प्रदायिक तनाव से भरे माहौल में और भी बहस को हवा देने वाली थी।
लेकिन जब वीडियो की सच्चाई जांची गई, तो पता चला कि यह क्लिप 2014 की एक सार्वजनिक अंतरराष्ट्रीय लेक्चर सीरीज़ का हिस्सा है। यह व्याख्यान 11 मार्च 2014 को ऑस्ट्रेलिया इंडिया इंस्टिट्यूट में दिया गया था और 20 मार्च 2014 को एक घंटे 17 मिनट की पूरी रिकॉर्डिंग के रूप में ऑनलाइन अपलोड हुआ था। इस पूरी रिकॉर्डिंग के लगभग 1:04:00 मिनट पर डोभाल साफ–साफ कहते हुए सुने जा सकते हैं कि ISI द्वारा भारत में 4,000 से अधिक मामलों में किए गए खुफिया कार्यों में “20 प्रतिशत से भी कम मुसलमान शामिल थे”—यानी अधिकांश मामले हिंदू व्यक्तियों से जुड़े थे। यह तथ्य खुद इस बात को प्रमाणित करता है कि वायरल क्लिप न तो डीपफेक है और न ही तकनीकी रूप से किसी प्रकार से छेड़ा गया है, क्योंकि 2014 में डीपफेक जैसी तकनीकों का व्यापक उपयोग अस्तित्व में ही नहीं था।
वीडियो का पूरा संदर्भ सामने आने पर इसकी महत्वता और बढ़ जाती है। अपने लेक्चर में डोभाल ने यह भी कहा था कि आतंकवाद को “हिंदू बनाम मुस्लिम” के चश्मे से देखना न सिर्फ गलत है बल्कि देश की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन, दोनों के लिए नुकसानदेह है। उन्होंने जोर देकर कहा था कि भारत के मुसलमानों ने आतंकवाद का हमेशा से कड़ा विरोध किया है—उन्होंने 2012 के रामलीला मैदान का उदाहरण दिया जहां 50,000 उलेमाओं ने वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ ऐतिहासिक फतवा जारी किया था। डोभाल ने कहा था कि दुनिया भर में आतंकवाद के 90 प्रतिशत शिकार मुसलमान ही होते हैं, इसलिए हिंसा करने वाले एक छोटे समूह को पूरे समुदाय से जोड़ देना देशहित में नहीं है।
यह वीडियो यह भी दर्शाता है कि डोभाल उस समय समुदायों के बीच संवाद, समझ और सहयोग की रणनीति को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का एक अहम आधार मानते थे। उन्होंने कहा था कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई किसी धर्म, मजहब या जाति से नहीं, बल्कि भारत के लिए एक संयुक्त राष्ट्रीय संघर्ष है। इसी सन्दर्भ में उन्होंने ISI द्वारा अधिकतर हिंदू भर्ती किए जाने की पुष्टि करते हुए बताया था कि “यह धारणा बिल्कुल गलत है कि यह लड़ाई हिंदू बनाम मुस्लिम है। यह लड़ाई भारत की है।”
जब आज के राजनीतिक माहौल में इस पुराने बयान को सार्वजनिक होने के बाद “डीपफेक” कहा गया, तो इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि किस तरह अब राजनीतिक दबाव, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा की बहसें एक साथ मिलकर सच्चाई को धूमिल करने की कोशिश करती हैं। लेकिन पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बाद यह निर्विवाद सत्य है कि यह बयान डोभाल ने स्वयं दिया था और इसे नकली बताने का दावा तथ्यात्मक रूप से गलत साबित हुआ है।
2014 का वीडियो असली है, बयान प्रामाणिक है, और इसे “डीपफेक” कहना वास्तविकता से भागने की राजनीतिक कोशिश मात्र है। लोकतंत्र में सच देर से सामने आता है, लेकिन आता ज़रूर है।




