पटना/ नई दिल्ली 27 अक्टूबर 2025
सुशासन का सपना और बिहार की आज की सच्चाई
कभी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य की जनता से वादा किया था कि वे जंगलराज को खत्म करेंगे और सुशासन का एक नया युग शुरू करेंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि बिहार को “विकास” और “सुरक्षा” का संगम बनाने के लिए डबल इंजन की ताकत का उपयोग किया जाएगा — यानी केंद्र में बीजेपी की सरकार और राज्य में एनडीए की सत्ता मिलकर विकास का पहिया तेज़ी से घुमाएंगी। लेकिन दो दशक बीतने के बाद यह स्पष्ट हो चुका है कि सुशासन का वह सपना अब मृगतृष्णा बन चुका है। नीतीश कुमार के शासनकाल का यह दौर बिहार के नागरिकों के लिए भय, भ्रष्टाचार, अपराध और अविश्वास का पर्याय बन गया है। विकास के वादे खोखले साबित हुए हैं, और जिस बिहार को उन्होंने ‘अपराध-मुक्त राज्य’ बनाने की बात कही थी, वही आज फिर अपराध के दलदल में धँसता जा रहा है।
लाल अपराध ग्राफ़ की हकीकत: आंकड़ों में ‘कुशासन’ का चेहरा
बिहार सरकार चाहे कितने भी प्रचार अभियानों से सुशासन की छवि बनाने की कोशिश करे, मगर आंकड़े सच्चाई की चीखती हुई तस्वीर पेश करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में बिहार में अपराधों की दर में लगभग 80 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। 2015 में जहां कुल दर्ज अपराधों की संख्या करीब 1.9 लाख थी, वहीं 2024 तक यह बढ़कर 3.5 लाख से ऊपर पहुंच गई। यानी हर दिन औसतन 900 से अधिक अपराध। इनमें हत्या, लूट, दुष्कर्म, अपहरण और हथियारों से जुड़े अपराध सबसे तेजी से बढ़े हैं।
हत्याओं की दर में बिहार राष्ट्रीय औसत से आगे निकल चुका है — प्रति लाख जनसंख्या पर 2.3 हत्या जबकि राष्ट्रीय औसत 2.1 है। ‘हत्या का प्रयास’ के मामलों में भी बिहार देश के शीर्ष पाँच राज्यों में शामिल है। 2015 में 5,981 मामले दर्ज हुए थे, जो 2022 में बढ़कर 8,667 हो गए। यह 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है। इसी दौरान हथियारों से जुड़े अपराध लगभग दोगुने हुए हैं। जब सरकार “कानून-व्यवस्था नियंत्रण में है” का दावा करती है, तो ये आंकड़े उस बयान को झूठा साबित करते हैं।
अपराध के कारण: शासन की कमजोरी और प्रशासनिक नाकामी
बिहार में बढ़ते अपराधों के पीछे सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की गहरी नाकामी है। राज्य में पुलिस का अनुपात प्रति लाख आबादी पर मात्र 78 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 152 है। यानी पुलिस की ताकत आधी से भी कम। नतीजा यह है कि अपराधी बेखौफ घूमते हैं, अपराध बढ़ते हैं और कानून नाम की चीज़ केवल पोस्टर पर रह गई है। संपत्ति विवाद, जातीय संघर्ष, निजी बदले की भावना और बेरोज़गारी अपराध के प्रमुख कारण बन गए हैं।
आंकड़े बताते हैं कि लगभग 38 प्रतिशत हत्याएं व्यक्तिगत प्रतिशोध के कारण होती हैं, जबकि 35 प्रतिशत भूमि और संपत्ति विवाद से जुड़ी होती हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि पुलिस-प्रशासनिक हस्तक्षेप समय पर नहीं होता। कई बार स्थानीय पुलिस राजनीतिक दबाव या रिश्वत के कारण शिकायत दर्ज करने से बचती है। परिणाम — अपराधी मानसिक रूप से निर्भीक हो जाते हैं और शासन-प्रणाली जनता का विश्वास खो देती है।
सुशासन से कुशासन तक: नीतीश मॉडल की असफलता
नीतीश कुमार ने जब 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाला था, तो उन्होंने “सुशासन बाबू” की पहचान बनाई। सड़कों, स्कूलों और कानून-व्यवस्था में सुधार के शुरुआती कदमों से लोगों को उम्मीद थी कि बिहार बदल रहा है। परंतु यह सुधार अस्थायी साबित हुआ। समय के साथ वही नीतीश मॉडल जिसने कभी उम्मीद जगाई थी, अब निराशा और अव्यवस्था का प्रतीक बन गया है।
बिहार में आज स्थिति यह है कि हर बड़े शहर — चाहे पटना हो, गया, मुजफ्फरपुर या भागलपुर — अपराध की खबरें रोज़ की बात हो गई हैं। दिन-दहाड़े हत्या, अपहरण और लूट जैसे अपराध अब असामान्य नहीं माने जाते। पुलिस अक्सर अपराधियों के पीछे नहीं बल्कि खबर दबाने में लगी होती है। जनता का विश्वास प्रशासन से पूरी तरह उठ चुका है। “सुशासन” अब एक सरकारी नारा मात्र बन गया है, जबकि जमीनी सच्चाई “कुशासन” की चीख है।
पडबल इंजन की सरकार — डबल फेल व्यवस्था
नीतीश कुमार और बीजेपी की डबल इंजन सरकार ने यह दावा किया था कि केंद्र और राज्य मिलकर बिहार को विकास की रफ्तार देंगे। लेकिन आज बिहार देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है। बेरोज़गारी दर 15 प्रतिशत से अधिक है, शिक्षा व्यवस्था चरमराई हुई है, स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं, और अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं।
केंद्र सरकार विकास के नाम पर आंकड़े देती है, और राज्य सरकार अपराध पर ‘झूठे प्रेस नोट’। हकीकत यह है कि डबल इंजन की यह सरकार जनता की नज़र में डबल फेल सरकार बन चुकी है। एक इंजन भ्रष्टाचार में फंसा है और दूसरा इंजन कानून-व्यवस्था की दलदल में। नतीजा यह है कि बिहार की गाड़ी फिर वहीं खड़ी है जहाँ बीस साल पहले थी — गरीबी, भय और असमानता के उसी चौक पर।
प्रशासनिक विफलता: पुलिस और शासन के बीच अविश्वास
बिहार में अपराध के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है पुलिस और जनता के बीच अविश्वास की खाई। जनता को विश्वास नहीं कि पुलिस उनकी रक्षा करेगी, और पुलिस को भरोसा नहीं कि सरकार उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने देगी। अफसरों के तबादले राजनीतिक समीकरणों के अनुसार होते हैं, थानों में निर्णय आदेशों के बजाय निर्देशों से होते हैं।
कई बार देखा गया है कि किसी नेता के समर्थक अपराध में पकड़े जाते हैं तो स्थानीय पुलिस पर “ऊपर से फोन” आता है। परिणाम यह कि अपराधी बच निकलते हैं और जनता संदेश पाती है — कानून अमीर या प्रभावशाली के लिए नहीं, गरीब के लिए है। यही मानसिकता समाज में ‘कानून की बेइज्जती’ को जन्म देती है।
सामाजिक विघटन और भय का माहौल
अपराध सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है, यह समाज के नैतिक विघटन की गाथा भी है। जब समाज में यह भावना बैठ जाती है कि अपराध करने पर कुछ नहीं होगा, तो वह राज्य अराजकता की ओर बढ़ता है। आज बिहार में यही हो रहा है। हर घर में सुरक्षा का डर, हर माता-पिता में यह चिंता कि उनका बेटा शाम तक सुरक्षित लौटेगा या नहीं। गाँवों में भूमि विवाद गोलीकांड में बदल रहे हैं, और शहरों में लड़कियों की सुरक्षा एक मज़ाक बन चुकी है।
यह वही बिहार है जिसने कभी बुद्ध और गाँधी को जन्म दिया था — आज वही राज्य हिंसा और भ्रष्टाचार की गंध से भर गया है। नीतीश कुमार का शासन इस भयावह वातावरण के लिए सीधे जिम्मेदार है, क्योंकि शासन की पहली जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा होती है, और उन्होंने इसे सबसे ज़्यादा उपेक्षित किया।
राजनीतिक अवसरवाद और प्रशासनिक पतन
नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में जितनी बार पाला बदला है, उतनी बार शायद ही किसी मुख्यमंत्री ने किया होगा। कभी एनडीए में, फिर महागठबंधन में, फिर एनडीए में और अब फिर से गठबंधन बदलने की अटकलें — यह राजनीतिक अस्थिरता शासन की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई है। जब नेता खुद निश्चयहीनता में जिए, तो प्रशासन किस दिशा में जाएगा?
नीतीश कुमार का ध्यान शासन पर नहीं, सत्ता बचाने पर केंद्रित रहा है। यही कारण है कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। प्रशासन यह समझ चुका है कि “जो सत्ता के करीब है, वही सुरक्षित है।” और जनता यह जान चुकी है कि “जो गरीब है, वही पीड़ित है।” बिहार की जनता इस राजनीतिक अवसरवाद की सबसे बड़ी शिकार है।
बेरोजगारी, शिक्षा और अपराध का गहरा रिश्ता
बिहार की अपराध समस्या सिर्फ पुलिस की नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की भी विफलता है। बेरोजगारी दर बढ़ती जा रही है। 2025 में यह लगभग 16 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। युवाओं में हताशा, गरीबी और अवसरों की कमी उन्हें गलत रास्ते की ओर धकेल रही है।
सरकार की शिक्षा नीतियाँ ढीली हैं — शिक्षक नियुक्तियों में भ्रष्टाचार, विद्यालयों की बदहाल हालत और बेरोज़गार डिग्रीधारी नौजवानों की भीड़ अब बम के समान विस्फोटक बन चुकी है। जब पेट खाली हो और शासन संवेदनहीन, तो अपराध अपने आप बढ़ता है। सुशासन की जगह ‘सर्वाइवल का संघर्ष’ हावी हो जाता है।
मीडिया का दबाव और सच्चाई का दम घुटना
नीतीश कुमार के शासन में स्वतंत्र मीडिया पर भी दबाव है। राज्य के पत्रकारों को अपराध रिपोर्ट करने पर धमकाया जाता है, विज्ञापन रोके जाते हैं, और सत्ता विरोधी खबरों को “नकारात्मक” करार दिया जाता है। परिणामस्वरूप, जनता तक वास्तविक अपराध की खबरें पूरी तरह नहीं पहुँचतीं।
राज्य सरकार अपराध के आंकड़े ‘कंट्रोल्ड’ रूप में जारी करती है ताकि “सुशासन” का भ्रम कायम रहे। लेकिन सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों की रिपोर्टें इस नकली आवरण को रोज़ चीर रही हैं। अब जनता जान चुकी है कि बिहार का प्रशासन केवल प्रेस विज्ञप्तियों में सशक्त है, जमीनी हकीकत में नहीं।
क्या बिहार फिर जंगलराज की ओर बढ़ रहा है?
यह सवाल अब सिर्फ विपक्ष या आलोचकों का नहीं रहा, बल्कि हर नागरिक के मन का है। बिहार में लगातार बढ़ते अपराध, पुलिस की निष्क्रियता, राजनीतिक हस्तक्षेप और शासन की ढिलाई ने मिलकर वह भयावह परिदृश्य बना दिया है, जिसे कभी “जंगलराज” कहा जाता था। आज वही हालात दोहराए जा रहे हैं, बस नाम बदल गया है।
“सुशासन” का झंडा लिए नीतीश कुमार के शासन में बिहार फिर उसी अंधेरे की ओर लौट रहा है, जहाँ जीवन सस्ता और अपराध महंगा नहीं रहा। जब किसी राज्य के नागरिक भय और असुरक्षा में जीने लगें, तो विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सब निरर्थक हो जाते हैं।
सुधार के रास्ते और भविष्य की चुनौती
अगर बिहार को इस दलदल से निकालना है, तो सिर्फ आंकड़ों से नहीं — नीयत से बदलाव लाना होगा। अपराध नियंत्रण के लिए राज्य पुलिस को स्वतंत्र और पेशेवर बनाना होगा। अपराधियों के राजनीतिक संरक्षण को खत्म करना अनिवार्य है। साथ ही, शिक्षा और रोजगार को नीति के केंद्र में लाना होगा, ताकि अपराध का सामाजिक आधार टूटे।
सरकार को अपराध डेटा सार्वजनिक करना चाहिए, एफआईआर दर्ज करने में पारदर्शिता लानी चाहिए, और पुलिस सुधार आयोग का गठन करना चाहिए। जब तक जनता को यह भरोसा नहीं होगा कि सरकार उनकी सुरक्षा के प्रति ईमानदार है, तब तक “सुशासन” शब्द एक छलावा बना रहेगा।
बिहार को फिर से जागना होगा
नीतीश कुमार की सरकार अब उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ जनता का धैर्य टूट चुका है। डबल इंजन की डबल फेल नीति ने बिहार को भय और भ्रष्टाचार के अंधकार में धकेल दिया है। अपराध के आंकड़े सुशासन की पोल खोलते हैं और जनता का की आवाज़ बुलंद करे, और शासन से सवाल पूछे — “कहाँ गया वह सुशासन जिसका वादा किया था?” अगर जवाब नहीं मिला, तो इतिहास नीतीश कुमार को उसी पंक्ति में रखेगा जहाँ असफल नेता खड़े होते हैं, जिन्होंने वादे तो किए पर निभाए नहीं। बिहार को अब सिर्फ नई सरकार नहीं, नई नीयत चाहिए।




