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बंगाल की ‘बाबरी-स्टाइल’ मस्जिद के लिए चंदे की बाढ़—शुरुआती दौर में ही करोड़ों जुटे

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साजिद अली। कोलकाता 9 दिसंबर 2025

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में हुमायूं कबीर द्वारा प्रस्तावित “बाबरी मॉडल मस्जिद” ने राज्य भर में एक बड़ा सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक माहौल खड़ा कर दिया है। 6 दिसंबर को, जिस दिन बाबरी मस्जिद ध्वंस की बरसी मानी जाती है, उसी दिन इस नई मस्जिद की नींव रखी गई। यह प्रतीकात्मक तिथि ही इस आयोजन को और अधिक संवेदनशील बनाती है, और इसीलिए पूरे क्षेत्र में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए। भीड़ इतनी बड़ी थी कि कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने के रास्तों पर पुलिस को विशेष प्रबंधन करना पड़ा। हुमायूं कबीर ने अपने संबोधन में कहा कि मस्जिद का निर्माण पूरी तरह से संवैधानिक अधिकार है और इसमें कोई अवैधता नहीं है। यह सिर्फ एक धार्मिक प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक ढांचे का प्रारंभिक चरण है, जिसे वे समुदाय की बेहतरी के लिए समर्पित मानते हैं।

मस्जिद निर्माण के लिए चंदा जिस रफ्तार से आ रहा है, उसने स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। कार्यक्रम स्थल पर लगाए गए डोनेशन बॉक्स खोलते ही लाखों रुपये नकद निकले और साथ ही ऑनलाइन माध्यम—विशेषकर UPI और QR कोड—से चंदा निरंतर आता रहा। शुरुआती गणना में ही लगभग ₹2.4 करोड़ की राशि एकत्र होने की पुष्टि हुई है। इसमें करीब ₹2.1 करोड़ डिजिटल भुगतान के माध्यम से आए, जबकि ₹37 लाख नकद दान के रूप में मिले। इसके अलावा देखने लायक दृश्य यह रहा कि आसपास के गांवों के लोग ट्रैक्टरों और ट्रकों में ईंटें भरकर लाए, जिससे हाईवे पर जाम लग गया। ऐसी स्थिति तब पैदा होती है जब कोई आंदोलन चरित्र ग्रहण कर ले—और यह निर्माण परियोजना अब स्थानीय लोगों के लिए सिर्फ एक धार्मिक प्रयास नहीं, बल्कि सामुदायिक गर्व का बड़ा केंद्र बन चुकी है।

हुमायूं कबीर ने यह भी स्पष्ट किया है कि मस्जिद निर्माण का उद्देश्य केवल एक इबादतगाह बनाना नहीं है। उनका कहना है कि यह परियोजना एक बड़े सामाजिक और सेवा-संरचना मॉडल का हिस्सा है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹300 करोड़ बताई जा रही है। मस्जिद के साथ एक 100-बेड का आधुनिक अस्पताल, एक विशाल सभागार, अतिथि-गृह और कई सामाजिक सुविधाएँ विकसित की जाएँगी। वे दावा करते हैं कि एक उद्योगपति ने ₹80 करोड़ तक देने की पेशकश की है, जबकि अन्य व्यापारी और समुदाय-नेता भी इस परियोजना में सहयोग देने को तैयार हैं। इस स्तर पर फंडिंग और वादों का होना यह संकेत देता है कि यह प्रोजेक्ट भविष्य में एक बड़े धार्मिक-सामाजिक परिसर का रूप ले सकता है, जिसका प्रभाव इलाके के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में दूरगामी बदलाव ला सकता है।

मस्जिद की नींव रखने के कार्यक्रम में भी काफी धन खर्च हुआ, जो इस आयोजन की भव्यता और पैमाने को खुद स्पष्ट करता है। आयोजन मंच पर लगभग ₹13 लाख खर्च हुए, सजावट पर ₹2 लाख और भोजन पर—खासकर 40,000 बिरयानी पैकेट तैयार कराने में—लगभग ₹22 लाख की राशि लगी। इतने बड़े स्तर के भोजन वितरण से यह संकेत मिला कि कार्यक्रम मात्र राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि समुदाय के आंतरिक उत्साह और भावनात्मक जुड़ाव का प्रत्यक्ष प्रमाण था। भीड़ का आकार, धार्मिक नारों का वातावरण और कबीर के भाषण के दौरान गूंजता जनसमर्थन यह बताता है कि यह मस्जिद केवल एक निर्माण परियोजना नहीं बल्कि एक उभरते सामुदायिक आंदोलन का स्वरूप ले चुकी है।

लेकिन इन सबके बीच राजनीतिक तापमान भी काफी बढ़ गया है। विपक्षी दलों ने इस आयोजन को खुलकर “ध्रुवीकरण की राजनीति” बताया है और आरोप लगाया है कि आगामी चुनावों को देखते हुए धार्मिक भावनाओं को भड़काने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं राज्य सरकार और कबीर समर्थक इसे लोगों के धार्मिक अधिकार और सामाजिक विकास का कदम बताते हैं। इस बहस में कुछ नेताओं ने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए हैं, हालांकि कबीर ने स्वयं मंच से कहा कि पुलिस ने “पूरी ईमानदारी से सहयोग” किया, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहा। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, परंतु मस्जिद निर्माण को लेकर समुदाय में जो उत्साह दिख रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि यह परियोजना लंबे समय तक बंगाल की राजनीति और सामाजिक ढांचों को प्रभावित करेगी।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठ रहा है कि इतनी बड़ी रकम का प्रबंधन और उपयोग कैसे होगा। ₹300 करोड़ जैसे भारी बजट के बीच पारदर्शिता, लेखा-परीक्षण, दान के स्रोतों की निगरानी और फंड के व्यय का विस्तृत ब्योरा समय के साथ और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा। दान की मात्रा बढ़ने की संभावना है, इसलिए एक ठोस और सार्वजनिक जवाबदेही ढांचा ज़रूरी है, ताकि किसी तरह की वित्तीय अनियमितता या राजनीतिक दुरुपयोग का अवसर न मिले। साथ ही, इतने बड़े धार्मिक प्रोजेक्ट के चलते क्षेत्र में सामाजिक तनाव की संभावना को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास और धार्मिक गतिविधियों के बीच संतुलन बना रहे, और स्थानीय शांति प्रभावित न हो।

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