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चंदा और धंधा : सेमीकंडक्टर सब्सिडी से लेकर राजनीतिक चंदे तक की चौंकाने वाली कड़ी

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महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 28 नवंबर 2025

फरवरी 2024 में मोदी कैबिनेट ने भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तीन मेगा यूनिट मंज़ूर किए। यह फैसला देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए ऐतिहासिक माना गया, क्योंकि सेमीकंडक्टर चिप्स—जो मोबाइल से लेकर रक्षा उपकरणों तक हर जगह इस्तेमाल होते हैं—भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक ज़रूरत हैं। सरकार ने घोषणा की कि इन परियोजनाओं की कुल लागत का 50% हिस्सा केंद्र सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करेगी, ताकि बड़े उद्योग समूह निवेश के लिए आगे आएँ और भारत तेजी से चिप निर्माण हब बन सके।

लेकिन मंज़ूरी के बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इस पूरे निर्णय को आर्थिक नीति से ज़्यादा राजनीतिक लाभ से जोड़कर देखे जाने की बहस छेड़ दी। तीन में से दो सेमीकंडक्टर यूनिट्स टाटा समूह को आवंटित हुईं, जो पहले से ही इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश की तैयारी कर रहा था। सब्सिडी के नियमों के अनुसार दोनों यूनिट्स को मिलाकर लगभग ₹45,000 करोड़ की सरकारी सहायता सीधे टाटा समूह के खातों में जाने वाली थी। यह रकम किसी भी औद्योगिक सब्सिडी के मुकाबले बेहद बड़ी और भारत के कॉरपोरेट सेक्टर की अब तक की सबसे ऊँची मददों में से एक कही गई।

इसी के बाद सबसे विस्फोटक तथ्य सामने आया—मंज़ूरी के सिर्फ एक महीने बाद टाटा समूह ने BJP को ₹758 करोड़ का राजनीतिक चंदा दिया। यह भारत में किसी भी कॉरपोरेट द्वारा किसी राजनीतिक दल को दिया गया सबसे ऊँचा एकमुश्त चंदा था। संयोग कहें या रणनीतिक धंधा, यह समय-संबंध इतना सटीक था कि सवाल उठने लाज़मी थे। क्या यह सिर्फ कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी थी? या फिर सरकारी सब्सिडी और राजनीतिक चंदे के बीच कोई अदृश्य रिश्ता भी था?

इसी दौरान विरोधी दलों पर सरकारी संस्थाओं की कड़ी कार्रवाई भी देखने को मिली। चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी के बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए गए, जिससे वह अपने चुनावी अभियान तक नहीं चला सकी। जबकि दूसरी तरफ BJP को मिलने वाला चंदा—जिसमें टाटा का 758 करोड़ भी शामिल था—इतिहास का सबसे बड़ा चुनावी फंड बन गया। इतने धन, संसाधन और सरकारी मशीनरी के बाद भी BJP को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका—यह तथ्य पूरे मामले को और भी दिलचस्प बना देता है।

यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ अर्थव्यवस्था और राजनीति की कड़ियों को उजागर नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि देश में “चंदा और धंधा” का मॉडल अब नई ऊँचाइयों पर पहुँच चुका है। जहाँ एक तरफ सरकारी सब्सिडी निजी कंपनियों को लाभ पहुँचाती है, वहीँ दूसरी तरफ वही कंपनियाँ राजनीतिक दलों को चंदा देकर सत्ता के समीकरण मजबूत करती हैं। इससे लोकतंत्र में समान अवसर, पारदर्शिता और नीति की शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। जनता यह पूछने का अधिकार रखती है—
क्या सरकारी नीतियाँ वास्तव में देशहित में बनती हैं, या फिर “धंधा” पहले तय होता है और “चंदा” बाद में आता है?

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