एबीसी डेस्क 9 दिसंबर 2025
देश की प्रमुख सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर विवादों के निशाने पर है। ताज़ा खुलासे के अनुसार, साल 2021–22 में BJP ने भारत सरकार की कल्याणकारी योजनाओं—बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ, किसान सेवा और स्वच्छ भारत मिशन—के नाम पर बड़े पैमाने पर चंदा जुटाया। यह खुलासा पत्रकार बी.आर. अरविंदाक्षन द्वारा मांगी गई RTI के जवाबों में हुआ, जिसमें स्पष्ट बताया गया कि BJP को ना तो किसी भी केंद्रीय मंत्रालय, और ना ही प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की ओर से इस तरह की फंडिंग के लिए कोई अनुमति दी गई थी। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार की योजनाओं का नाम लेकर पार्टी ने लोगों से पैसा वसूला, जबकि इसकी कोई वैधानिक मंज़ूरी मौजूद नहीं थी।
RTI दस्तावेज़ों से सामने आया है कि BJP ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म—narendramodi.in और NaMo App—का उपयोग करते हुए इस ‘डोनेशन ड्राइव’ को आगे बढ़ाया। अभियान को इस तरह पेश किया गया मानो दान सीधे देशहित से जुड़ी सरकारी योजनाओं के लिए किया जा रहा हो। हजारों लोगों ने यह सोचकर दान दिया कि उनका पैसा ‘बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ’ या ‘स्वच्छ भारत’ जैसी राष्ट्रीय योजनाओं में लगेगा, जबकि हकीकत यह है कि यह पैसा सीधे BJP के ‘पार्टी फंड’ में जमा हुआ। कई नेताओं और समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए रसीदों में भी ऐसे ही शब्दों का उपयोग हुआ, जिससे लोगों को यह भ्रम हुआ कि वे केंद्र सरकार की योजनाओं में योगदान दे रहे हैं।
यह मामला केवल नैतिक भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे चल रही सत्ता–संगठन की मिलीभगत की ओर भी संकेत करता है। सवाल उठ रहे हैं कि जब किसी भी सरकारी मंत्रालय ने BJP को केंद्र योजनाओं के नाम पर दान इकठ्ठा करने की अनुमति नहीं दी, तो पार्टी ने यह कदम उठाया कैसे? और अगर यह कदम बिना अनुमति लिया गया, तो क्या प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय नेतृत्व इससे अनभिज्ञ थे—या फिर यह पूरा अभियान सत्ता की जानकारी और संरक्षण में संचालित हुआ? विशेषज्ञ इसे जनता की भावनाओं और देशहित के नाम पर खुलेआम धोखाधड़ी बताते हैं, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्वीकार्य है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस ‘डोनेशन ड्राइव’ को बढ़ावा देने वाला कोई सामान्य कार्यकर्ता नहीं, बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। PM की आधिकारिक वेबसाइट और NaMo App से चलाए गए इस अभियान ने इसे सरकारी पहल जैसा रूप दे दिया। इसी वजह से जनता यह समझ ही नहीं पाई कि दान वास्तव में सरकार को नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी को दिया जा रहा है। इससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या प्रधानमंत्री को इस बात की जानकारी नहीं थी कि सरकारी योजनाओं के नाम पर पार्टी फंडिंग करना अवैध और अनैतिक है? अगर जानकारी थी तो जवाबदेही उनसे ही बनती है, और अगर जानकारी नहीं थी तो शासन तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।
विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने इस खुलासे को ‘स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार’ और जनता के साथ धोखा बताया है। उनका तर्क है कि अगर देश की सबसे बड़ी पार्टी ही सरकारी योजनाओं के नाम पर पैसे जुटाने लगे तो आम नागरिक किस पर भरोसा करे। कई विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रकरण चुनावी फंडिंग और राजनीतिक नैतिकता पर कठोर कानून बनाने की आवश्यकता को और मजबूती से रेखांकित करता है। क्योंकि यह मामला सिर्फ BJP का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है।
अब देश की जनता और विपक्ष एक ही सवाल पूछ रहा है—
* प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह बताएं कि सरकारी योजनाओं के नाम पर पार्टी फंड इकट्ठा करने का निर्णय किसने लिया?
* बिना सरकारी मंजूरी के जनता से पैसा वसूला गया—तो क्या यह अपराध नहीं है?
* क्या दान की यह रकम वापस की जाएगी?
RTI ने पर्दा उठा दिया है। अब देश जवाब चाहता है—और जवाब प्रधानमंत्री को देना ही होगा।




