महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 11 जनवरी 2026
सुरक्षा के नाम पर जासूसी और निजता में दखल का खतरनाक प्रस्ताव
भारत सरकार ने स्मार्टफोन सुरक्षा के नाम पर जो नया प्रस्ताव पेश किया है, उसने एक गंभीर और असहज सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सरकार अब हर नागरिक के मोबाइल फोन तक सीधी पहुंच चाहतीनिजता है? स्मार्टफोन कंपनियों से सोर्स कोड मांगने का यह कदम सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की निजता, व्यक्तिगत आज़ादी और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ मामला बन गया है। सोर्स कोड कोई साधारण दस्तावेज़ नहीं होता, बल्कि वही “चाबी” होती है जिससे किसी भी फोन के सॉफ्टवेयर के हर कोने तक पहुंच बनाई जा सकती है। ऐसे में सरकार को यह अधिकार देना, कि वह उस चाबी को अपने पास रखे, स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में डर और अविश्वास पैदा करता है। सरकार का तर्क है कि यह सब साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण के लिए किया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सुरक्षा के नाम पर हर नागरिक को संभावित निगरानी के दायरे में लाना जायज़ है? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहां सुप्रीम कोर्ट निजता को मौलिक अधिकार घोषित कर चुका है, वहां ऐसा प्रस्ताव सीधे-सीधे उस अधिकार से टकराता दिखता है। अगर सरकार को हर फोन के सॉफ्टवेयर की पूरी जानकारी होगी, अगर अपडेट, लॉग और सिस्टम गतिविधियों तक उसकी पहुंच होगी, तो यह भरोसा कौन देगा कि इसका इस्तेमाल केवल “सुरक्षा” तक ही सीमित रहेगा? इतिहास बताता है कि जब भी सत्ता को जरूरत से ज्यादा ताकत मिलती है, उसका दुरुपयोग होने का खतरा भी उतना ही बढ़ जाता है।
यह कोई छोटी बात नहीं है कि दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां—ऐप्पल, गूगल, सैमसंग, शाओमी—और इंडस्ट्री संगठन खुलकर इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सोर्स कोड साझा करना न सिर्फ व्यावहारिक रूप से मुश्किल है, यह वैश्विक गोपनीयता मानकों के भी खिलाफ है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब दुनिया के किसी और लोकतांत्रिक देश में ऐसा नियम नहीं है, तो भारत को ही यह “प्रयोगशाला” क्यों बनाया जा रहा है? क्या भारत सरकार यह संकेत देना चाहती है कि यहां काम करने के लिए कंपनियों को नागरिकों की निजता पर समझौता करना ही होगा?
सरकार द्वारा फोन में एक साल तक लॉग रखने, लगातार मैलवेयर स्कैनिंग और हर बड़े सॉफ्टवेयर अपडेट की पूर्व सूचना जैसी शर्तें भी चिंता बढ़ाती हैं। ये सब मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं, जहां हर स्मार्टफोन एक संभावित निगरानी उपकरण में बदल सकता है। आम आदमी के लिए मोबाइल अब सिर्फ एक डिवाइस नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी का हिस्सा है—उसकी बातचीत, उसकी सोच, उसकी तस्वीरें, उसकी लोकेशन, उसकी निजी दुनिया। ऐसे में यह डर स्वाभाविक है कि कहीं यह प्रस्ताव “सुरक्षा” से ज्यादा निगरानी और नियंत्रण का औज़ार न बन जाए।
सरकार कह रही है कि अभी चर्चा जारी है और उद्योग की चिंताओं को सुना जाएगा, लेकिन असली सवाल यह है कि नागरिकों की आवाज़ कहां है? क्या इस प्रस्ताव पर जनता से कोई राय ली गई? क्या संसद में इस पर खुली बहस हुई? या फिर एक बार फिर बड़े फैसले चुपचाप, फाइलों और समितियों के भीतर तय कर लिए जाएंगे? लोकतंत्र में सुरक्षा और आज़ादी के बीच संतुलन ज़रूरी है, लेकिन अगर यह संतुलन टूटे और पलड़ा सत्ता की ओर झुक जाए, तो उसका खामियाज़ा आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। सवाल बहुत सीधा है—क्या भारत एक सुरक्षित डिजिटल समाज बनाना चाहता है, या एक ऐसा समाज जहां हर नागरिक को यह डर हो कि उसका फोन, उसकी जेब में रखा सबसे निजी उपकरण, किसी और की नज़रों में है? अगर सरकार सच में सुरक्षा चाहती है, तो उसे पारदर्शिता, स्वतंत्र निगरानी और मजबूत कानूनी गारंटी देनी होगी। वरना यह प्रस्ताव इतिहास में उस कदम के रूप में याद रखा जाएगा, जिसने सुरक्षा के नाम पर लोगों की निजता में गहरी खलल डाल दी।




