महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 9 दिसंबर 2025
राज्यसभा की कार्यवाही उस समय असाधारण रूप से तीखी हो गई जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ‘वंदे मातरम्’ पर चल रही बहस के दौरान केंद्र सरकार पर ऐसा सवाल दागा जिसने सत्ता पक्ष को पूरी तरह असहज कर दिया। खरगे का सीधा और बेबाक सवाल—“क्या आप हिटलर की किताब को मानते हैं?”—सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल की वैचारिक जड़ों की ओर संकेत करता हुआ एक गहरा और ऐतिहासिक प्रहार था। संसद का माहौल अचानक सन्नाटे में बदल गया, क्योंकि विपक्ष के इस सवाल में सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि लोकतंत्र और फासीवाद के बीच फर्क समझाने की एक सशक्त चेतावनी भी छिपी थी।
खरगे ने अपने भाषण में स्पष्ट किया कि राष्ट्रवाद किसी एक पार्टी की जागीर नहीं है और न ही देशभक्ति की परिभाषा किसी एक विचारधारा द्वारा तय की जा सकती है। उन्होंने तर्क देकर कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद—नेहरू, पटेल, आज़ाद, टैगोर और गांधी की विरासत—समावेशी, बहुलतावादी और लोकतांत्रिक है, जबकि सरकार जिस आक्रामक राष्ट्रवाद की वकालत कर रही है, वह दुनिया के उन दौरों की याद दिलाती है जहाँ किताबें, झंडे और नारे सत्ता का हथियार बन गए थे और जनता पर थोपे गए थे। खरगे ने इशारों में यह भी कहा कि ‘एक राष्ट्र–एक विचार’ की सोच वही है जिसे इतिहास ने हिटलरवाद और तानाशाही के रूप में दर्ज किया है—और भारत इस राह पर कभी नहीं चल सकता।
उन्होंने कहा कि देशभक्ति किसी को सर्टिफिकेट देकर या नारे थोपकर नहीं मापी जा सकती। चाहे ‘वंदे मातरम्’ हो या कोई और राष्ट्रीय प्रतीक—उनका सम्मान स्वेच्छा से होना चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए। खरगे ने कहा कि “हमारी आज़ादी की लड़ाई अंग्रेज़ों के खिलाफ थी, लेकिन वह लड़ाई उन विचारधाराओं के खिलाफ भी थी जो धर्म, नस्ल और भाषा के आधार पर देशों को बाँटती थीं। भारत की आत्मा—सर्वधर्म समभाव—कभी हिटलर की किताबों से नहीं निकली, बल्कि संविधान से निकली है।” उनके इस वक्तव्य ने विपक्षी दलों में ऊर्जा भर दी, जबकि सरकार के कई मंत्री जवाब देने से बचते नजर आए।
कांग्रेस ने इस बहस को सिर्फ एक राजनीतिक हमले की तरह नहीं देखा, बल्कि इसे लोकतांत्रिक चेतना की रक्षा का मुद्दा बताया। पार्टी का कहना है कि आज सत्ता पक्ष लोगों के बीच नया इतिहास गढ़ने की कोशिश कर रहा है—जहाँ राष्ट्रवाद का अर्थ सत्ता की आज्ञाकारिता, असहमति का अर्थ देशद्रोह और इतिहास का अर्थ वैचारिक प्रचार बना दिया गया है। खरगे का सवाल इस पूरी सोच को चुनौती देता है। उन्होंने सत्ता से पूछा कि “क्या आप भारत को उस दिशा में ले जाना चाहते हैं जहाँ असहमति अपराध बन जाए? जहाँ नेताओं की किताबें संविधान से ऊपर हो जाएँ? जहाँ राष्ट्रवाद का मतलब सिर्फ एक पार्टी का वर्चस्व रह जाए?”
खरगे के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस की लड़ाई किसी नारे या प्रतीक के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस खतरनाक प्रवृत्ति के खिलाफ है जिसमें सत्ता इतिहास को अपने राजनीतिक एजेंडा के मुताबिक मोड़ने की कोशिश करती है। जब खरगे ने हिटलर का उदाहरण दिया, तो यह सिर्फ एक तुलना नहीं थी—यह चेतावनी थी कि दुनिया का इतिहास सिखाता है कि जब राजनीतिक दल अपनी विचारधारा को राष्ट्र की पहचान बना देते हैं, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे दम तोड़ देता है। भारत की आत्मा—जो संविधान, आज़ादी की लड़ाई और विविधता के दर्शन से बनी है—कभी भी ऐसे मार्ग को स्वीकार नहीं कर सकती।
इस पूरी बहस में खरगे वह आवाज़ बने जो फासीवादी प्रवृत्तियों की पहचान करती है और लोकतंत्र को उसके मूल्यों की याद दिलाती है। उनकी वाणी में वह नैतिक बल था जो सत्ता की आक्रामकता के सामने भी नहीं झुका। कांग्रेस ने यह संदेश साफ दिया है कि राष्ट्रवाद का प्रमाण पत्र न तो सत्ता दे सकती है, न कोई विचारधारा—भारतीय होना ही सबसे बड़ा प्रमाण है। खरगे का प्रश्न इतिहास में दर्ज हो जाएगा, क्योंकि यह सिर्फ सरकार से नहीं पूछा गया, बल्कि उस सोच से पूछा गया है जो भारत की विविधता और लोकतांत्रिक नींव को चुनौती दे रही है।





