मोतहर हुसैन | नई दिल्ली | 17 फरवरी 2026
भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच — लोकसभा। यहां हर शब्द दर्ज होता है, हर सवाल इतिहास बनता है और हर चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है। इन दिनों संसद की कार्यवाही को देखते हुए कुछ सवाल बार-बार उठ रहे हैं, और वे सिर्फ विपक्ष की राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सत्ता पक्ष की रणनीति पर भी उंगली उठा रहे हैं।
आखिर क्यों ऐसा लग रहा है कि राहुल गांधी को अपने बयानों की पुष्टि खुद करने का खुला मैदान मिल रहा है? क्या सरकार की तरफ से ठोस और तत्काल जवाब देने की रणनीति कमजोर पड़ रही है? संसदीय परंपरा कहती है कि आरोपों का जवाब तथ्यों से दिया जाता है, न कि चुप्पी या इधर-उधर के बयानों से।
रक्षा मंत्री Rajnath Singh का संसद में अपेक्षाकृत कम दिखना चर्चा का विषय बन रहा है। गृह मंत्री Amit Shah भी कई महत्वपूर्ण बहसों के दौरान नजर नहीं आते। सवाल यह है कि जब विपक्ष आक्रामक मुद्रा में हो, तब क्या शीर्ष नेतृत्व का सदन में उपस्थित रहना और जवाब देना ज्यादा प्रभावी नहीं होता?
उधर, केंद्रीय मंत्री Hardeep Singh Puri का जेफरी एपस्टीन जैसे अंतरराष्ट्रीय विवादों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करना राजनीतिक गलियारों में हैरानी पैदा करता है। क्या यह उनका विषय है? या यह सिर्फ मीडिया नैरेटिव को मोड़ने की कोशिश है? इसी तरह, वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal जब व्यापार समझौतों पर प्रेस ब्रीफिंग करते हैं और कई सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाते, तो विपक्ष को और आक्रामक होने का मौका मिलता है।
विदेश मंत्री S. Jaishankar का प्रेस कॉन्फ्रेंस में उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय की ओर इशारा करना यह संकेत देता है कि सरकार के भीतर भी जिम्मेदारियों का स्पष्ट समन्वय चुनौती बन रहा है। जनता के लिए यह भ्रम की स्थिति है — आखिर जवाबदेही किसकी है?
प्रधानमंत्री Narendra Modi की शैली हमेशा से निर्णायक और केंद्रीकृत रही है। लेकिन जब मंत्रिमंडल के सदस्य अलग-अलग मुद्दों पर अपनी-अपनी व्याख्याएं देते नजर आते हैं, तो यह संदेश जाता है कि “जो उचित समझो वो करो” की भावना हद से ज्यादा फैल गई है। यह वही वाक्य है जो कभी जनरल नरवणे के संदर्भ में चर्चा में आया था — लेकिन क्या इसका मतलब यह था कि हर मंत्री अपनी सुविधा के अनुसार राजनीतिक मोर्चा संभाले?
लोकतंत्र में नेतृत्व की ताकत केवल भाषणों से नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी से मापी जाती है। अगर संसद में सवाल उठ रहे हैं, तो उनका जवाब संसद में ही दिया जाना चाहिए। अगर विवाद अंतरराष्ट्रीय हैं, तो उनकी स्पष्ट और एकीकृत रणनीति सामने आनी चाहिए।
यह लेख व्यंग्य जरूर है, लेकिन संकेत गंभीर है। सरकार की छवि केवल विपक्ष की आलोचना से नहीं, बल्कि अपनी जवाबदेही से बनती है। अगर मंत्रिमंडल के सदस्य अलग-अलग दिशाओं में संदेश देंगे, तो राजनीतिक भ्रम बढ़ेगा।
आखिर में बस इतना — राजनीति में “जो उचित समझो वो करो” से ज्यादा जरूरी है “जो सामूहिक रूप से तय हो, वही करो।” और हां, मोदी जी की इज्जत का ख्याल रखना भी सामूहिक जिम्मेदारी ही है।




