आलोक कुमार | नई दिल्ली, 26 नवंबर 2025
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणी की जिसने पूरे राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बदल दिया। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के मसले पर चल रही सुनवाई के अंत में, जब केंद्र सरकार के प्रस्तावित जाति जनगणना को लेकर अदालत में एक पक्ष ने अपनी बात रखी, तो CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट और दो-टूक कहा—“जो भी करें, समाज को जाति के आधार पर मत बाँटिए।” यह टिप्पणी न केवल अदालत की चिंताओं को रेखांकित करती है, बल्कि ऐसी चेतावनी भी देती है जिसमें देश की एकता, सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक विमर्श के खतरनाक मोड़ की ओर संकेत छिपा है।
सुनवाई के दौरान पीठ महाराष्ट्र में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी के राजनीतिक आरक्षण संबंधी मुद्दों पर विचार कर रही थी। लंबे समय से अटके इस प्रकरण में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है, लेकिन यह पूरी तरह उन कार्यवाहियों के अंतिम परिणाम पर निर्भर करेगा, जिन पर फिलहाल सुनवाई जारी है। राजनीतिक आरक्षण पर राज्यों और केंद्र के बीच जारी खींचतान के बीच मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब जाति जनगणना का सवाल राष्ट्रीय बहस का गर्म मुद्दा बना हुआ है। अदालत की टिप्पणी इस बात की ओर भी संकेत करती है कि सरकार चाहे जिस दिशा में बढ़ रही हो, देश की सबसे ऊंची न्यायिक संस्था सामाजिक संतुलन और राष्ट्रीय अखंडता को सर्वोच्च प्राथमिकता के रूप में देख रही है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की यह टिप्पणी उनके न्यायिक दर्शन की झलक भी देती है। कुछ ही दिनों पहले उनका शपथ ग्रहण राष्ट्रीय सुर्खियों में था, और अब उनकी यह सख्त, साफ़ और संवेदनशील टिप्पणी संकेत करती है कि वे सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर न सिर्फ सजग हैं, बल्कि किसी भी प्रकार की विभाजनकारी राजनीति से देश को बचाए रखने को लेकर भी प्रतिबद्ध हैं। जाति आधारित जनगणना पर विभिन्न राजनीतिक दलों की विरोधाभासी राय के बीच CJI का संदेश सत्ता, विपक्ष और नौकरशाही सभी के लिए एक नैतिक दिशा भी तय करता है—कि संवैधानिक मूल्यों से ऊपर जाकर कोई भी नीति समाज को तोड़ने वाली नहीं होनी चाहिए।
अदालत की यह मौखिक टिप्पणी उस व्यापक राजनीतिक परिदृश्य को भी छूती है जहां जाति की राजनीति चुनावी रणनीति का बड़ा औजार बनी हुई है। सामाजिक समानता और ऐतिहासिक अन्याय के सुधार की जरूरत के बीच, जाति की राजनीति अक्सर ऐसे मोड़ तक पहुँच जाती है जहां समाज का ध्रुवीकरण तेज़ हो जाता है। इस परिप्रेक्ष्य में CJI सूर्यकांत का कहना—“किसी भी परिस्थिति में समाज को जाति से मत बाँटिए”—न केवल एक कानूनी टिप्पणी है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने की सुरक्षा के लिए एक सशक्त सामाजिक संदेश भी है।
इस टिप्पणी के बाद अदालत ने आगे की सुनवाई की तारीख निर्धारित कर दी और स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनाव की प्रक्रिया रोकी नहीं जाएगी, लेकिन ओबीसी आरक्षण को लेकर अंतिम फैसला सर्वोच्च अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा। अदालत की इस संतुलित स्थिति ने एक ओर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को गतिमान रखा, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित किया कि आरक्षण से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर जल्दबाज़ी में कोई ऐसा निर्णय न हो जो कानूनी और सामाजिक स्तर पर विवाद बढ़ा दे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की यह टिप्पणी न केवल अदालत की इच्छा को दर्शाती है कि भारतीय समाज एकजुट रहे, बल्कि यह राजनीतिक दलों के लिए भी एक चेतावनी है कि वोट बैंक की राजनीति के नाम पर समाज को बाँटने की प्रवृत्तियाँ अंततः राष्ट्र के लिए हानिकारक हैं। आने वाले समय में जाति जनगणना और राजनीतिक आरक्षण जैसे मुद्दों पर सरकार और विपक्ष किस तरह आगे बढ़ते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन इतना तय है कि CJI की यह टिप्पणी इस बहस के केंद्र में एक नई संवैधानिक दृष्टि जोड़ चुकी है।




