एबीसी डेस्क 8 दिसंबर 2025
लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब वंदे मातरम् का मुद्दा उठाया, तो यह साफ़ दिख गया कि सरकार एक बार फिर इतिहास के भावनात्मक टुकड़ों को उठाकर राजनीतिक ध्रुवीकरण बनाने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री ने 1896 में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा वंदे मातरम् गाए जाने का ज़िक्र तो किया, लेकिन यह बड़ी सच्चाई छिपा गए कि वह अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का था—वही कांग्रेस जिसे वे आज हर मंच पर राष्ट्रविरोधी कहने में एक पल नहीं लगाते। यह सिर्फ तथ्य का छूट जाना नहीं, बल्कि इतिहास से वैसा हिस्सा चुन लेना है जो उनकी राजनीति को चमकाए, और वह हिस्सा छोड़ देना जो उनके तर्कों को ध्वस्त कर दे। वंदे मातरम् की सार्वजनिक प्रतिष्ठा कांग्रेस ने की, और मोदी सरकार इस सत्य से इसलिए डरती है क्योंकि यह RSS और BJP के राष्ट्रवाद की पूरी इमारत को अस्थिर कर देता है।
RSS का राष्ट्रवाद शुरू से ही स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर, और कई बार उसके विपरीत खड़ा दिखाई देता है। जब वंदे मातरम् ब्रिटिश शासन के खिलाफ उग्र प्रतिरोध का प्रतीक बन रहा था, जब हजारों लोग यह नारा लगाकर जेल जा रहे थे, तब RSS ने इस गीत को अपनी विचारधारा में शामिल ही नहीं किया। उन्होंने इसके बजाय अपना अलग गीत बनाया—‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि’। यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आज वही संगठन वंदे मातरम् का ठेका लिए घूमता है। अगर वे तब इस गीत को विद्रोह और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक मानते, तो यह उनकी सभाओं में गूँजता, उनके प्रशिक्षणों का हिस्सा बनता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह दूरी RSS की उस वैचारिक सोच को उजागर करती है जिसमें स्वतंत्रता संघर्ष को केंद्र में नहीं, बल्कि हाशिये पर रखा गया।
इतिहास का एक और असहज अध्याय हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की सांझी सरकारों से जुड़ा है—एक ऐसा तथ्य जिसे बीजेपी कभी स्वीकार नहीं करती। 1937 और 1942 के बीच कई प्रांतों में मुस्लिम लीग के साथ सत्ता में साझेदारी हिंदू महासभा ने की। सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस गठजोड़ का हिस्सा थे। यही मुस्लिम लीग आज भाजपा की राजनीति में राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा
वंदे मातरम् की आड़ में इतिहास का अपहरण: BJP–RSS की वैचारिक चाल, और कांग्रेस–नेहरू की असली विरासत का उजागर होता सच
लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब वंदे मातरम् का मुद्दा उठाया, तो यह साफ़ दिख गया कि सरकार एक बार फिर इतिहास के भावनात्मक टुकड़ों को उठाकर राजनीतिक ध्रुवीकरण बनाने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री ने 1896 में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा वंदे मातरम् गाए जाने का ज़िक्र तो किया, लेकिन यह बड़ी सच्चाई छिपा गए कि वह अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का था—वही कांग्रेस जिसे वे आज हर मंच पर राष्ट्रविरोधी कहने में एक पल नहीं लगाते। यह सिर्फ तथ्य का छूट जाना नहीं, बल्कि इतिहास से वैसा हिस्सा चुन लेना है जो उनकी राजनीति को चमकाए, और वह हिस्सा छोड़ देना जो उनके तर्कों को ध्वस्त कर दे। वंदे मातरम् की सार्वजनिक प्रतिष्ठा कांग्रेस ने की, और मोदी सरकार इस सत्य से इसलिए डरती है क्योंकि यह RSS और BJP के राष्ट्रवाद की पूरी इमारत को अस्थिर कर देता है।
RSS का राष्ट्रवाद शुरू से ही स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर, और कई बार उसके विपरीत खड़ा दिखाई देता है। जब वंदे मातरम् ब्रिटिश शासन के खिलाफ उग्र प्रतिरोध का प्रतीक बन रहा था, जब हजारों लोग यह नारा लगाकर जेल जा रहे थे, तब RSS ने इस गीत को अपनी विचारधारा में शामिल ही नहीं किया। उन्होंने इसके बजाय अपना अलग गीत बनाया—‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि’। यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आज वही संगठन वंदे मातरम् का ठेका लिए घूमता है। अगर वे तब इस गीत को विद्रोह और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक मानते, तो यह उनकी सभाओं में गूँजता, उनके प्रशिक्षणों का हिस्सा बनता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह दूरी RSS की उस वैचारिक सोच को उजागर करती है जिसमें स्वतंत्रता संघर्ष को केंद्र में नहीं, बल्कि हाशिये पर रखा गया।
इतिहास का एक और असहज अध्याय हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की सांझी सरकारों से जुड़ा है—एक ऐसा तथ्य जिसे बीजेपी कभी स्वीकार नहीं करती। 1937 और 1942 के बीच कई प्रांतों में मुस्लिम लीग के साथ सत्ता में साझेदारी हिंदू महासभा ने की। सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस गठजोड़ का हिस्सा थे। यही मुस्लिम लीग आज भाजपा की राजनीति में राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा खलनायक है, लेकिन इतिहास गवाही देता है कि वही मुस्लिम लीग RSS–Hindu Mahasabha की वैचारिक मंडली के साथ सत्ता में बैठी थी। यह तथ्य प्रधानमंत्री संसद में कभी नहीं बताएँगे, क्योंकि इससे पूरी कथा उलट जाती है—और यह स्पष्ट हो जाता है कि RSS और उससे जुड़े संगठनों की राजनीति स्वतंत्रता संघर्ष की नहीं, सत्ता की साझेदारी की राजनीति थी।
इसके विपरीत, कांग्रेस और नेहरू की भूमिका इतिहास में साफ़ और सशक्त रूप से मौजूद है। 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को, जब भारत स्वतंत्रता की घोषणा कर रहा था, उसी ऐतिहासिक क्षण में संविधान सभा में सुचेता कृपलानी ने वंदे मातरम् गाया—और यह निर्णय नेहरू और संविधान सभा ने लिया था। 24 जनवरी 1950 को जब भारत अपने राष्ट्रीय प्रतीकों का चयन कर रहा था, तब वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा कांग्रेस सरकार ने दिया। उस समय न जनसंघ था, न BJP, और RSS का तो स्थिति यह थी कि वह 52 साल बाद जाकर अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराने को तैयार हुआ। यह विडंबना नहीं, बल्कि इतिहास का बयान है कि जिनके हाथ में राष्ट्रीय प्रतीकों के निर्माण की कोई भूमिका नहीं थी, वे आज राष्ट्रवाद का सबसे ज़ोरदार दावा कर रहे हैं।
गौरव गोगोई ने अपने भाषण में इस बहस की दिशा पलट दी। उन्होंने दस्तावेज़ों के साथ हिंदू महासभा–मुस्लिम लीग की साझेदारी सामने रखी, और जैसे ही तथ्य प्रस्तुत हुए, सत्ता पक्ष की वैचारिक ढाल टूटती हुई नज़र आई। सरकार चाहती थी कि विपक्ष रक्षात्मक रहे, लेकिन इतिहास ने भाजपा को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। गोगोई के दो वाक्यों ने यह साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री की चयनात्मक कहानियों के सामने वास्तविक ऐतिहासिक दस्तावेज़ एक ऐसी रोशनी ला देते हैं जिसमें झूठ टिक नहीं पाता।
यह पूरा विवाद तब खड़ा किया गया जब देश अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी, महंगाई, चीन के साथ तनाव, PMO से जुड़े ऐप स्कैम और Epstein files जैसे गंभीर प्रश्नों का सामना कर रहा है। टिप्पणीकारों ने ठीक ही कहा कि यह मुद्दा असल समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए लाया गया है। राष्ट्रवाद की आड़ में विफलताओं को छिपाना मोदी सरकार की पुरानी रणनीति है, और हर बार इतिहास के एक ही पात्र—नेहरू—को निशाना बनाकर वे जनता को भ्रमित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जैसा प्रियंका गांधी ने कहा—“जितनी गालियाँ देना है, एक सूची बनाइए और एक दिन में दे दीजिए। इससे न महंगाई कम होगी, न बेरोज़गारी।”
अंततः सच यह है कि कांग्रेस ने 1886 से वंदे मातरम् को गाया, इसे राष्ट्रीय प्रतीक बनाया, और स्वतंत्रता के संघर्ष में अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। वहीं RSS न गीत अपनाने को तैयार हुई, न लड़ाई लड़ने को। वे अंग्रेजों से पेंशन लेते रहे और 52 साल तक अपने मुख्यालय पर तिरंगा तक नहीं फहराया। वही लोग आज राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रहे हैं—पर इतिहास उनसे बड़ा है, और जब भी वह सामने आता है, उनके दावों की परतें अपने आप उतर जाती हैं। खलनायक है, लेकिन इतिहास गवाही देता है कि वही मुस्लिम लीग RSS–Hindu Mahasabha की वैचारिक मंडली के साथ सत्ता में बैठी थी। यह तथ्य प्रधानमंत्री संसद में कभी नहीं बताएँगे, क्योंकि इससे पूरी कथा उलट जाती है—और यह स्पष्ट हो जाता है कि RSS और उससे जुड़े संगठनों की राजनीति स्वतंत्रता संघर्ष की नहीं, सत्ता की साझेदारी की राजनीति थी।
इसके विपरीत, कांग्रेस और नेहरू की भूमिका इतिहास में साफ़ और सशक्त रूप से मौजूद है। 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को, जब भारत स्वतंत्रता की घोषणा कर रहा था, उसी ऐतिहासिक क्षण में संविधान सभा में सुचेता कृपलानी ने वंदे मातरम् गाया—और यह निर्णय नेहरू और संविधान सभा ने लिया था। 24 जनवरी 1950 को जब भारत अपने राष्ट्रीय प्रतीकों का चयन कर रहा था, तब वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा कांग्रेस सरकार ने दिया। उस समय न जनसंघ था, न BJP, और RSS का तो स्थिति यह थी कि वह 52 साल बाद जाकर अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराने को तैयार हुआ। यह विडंबना नहीं, बल्कि इतिहास का बयान है कि जिनके हाथ में राष्ट्रीय प्रतीकों के निर्माण की कोई भूमिका नहीं थी, वे आज राष्ट्रवाद का सबसे ज़ोरदार दावा कर रहे हैं।
गौरव गोगोई ने अपने भाषण में इस बहस की दिशा पलट दी। उन्होंने दस्तावेज़ों के साथ हिंदू महासभा–मुस्लिम लीग की साझेदारी सामने रखी, और जैसे ही तथ्य प्रस्तुत हुए, सत्ता पक्ष की वैचारिक ढाल टूटती हुई नज़र आई। सरकार चाहती थी कि विपक्ष रक्षात्मक रहे, लेकिन इतिहास ने भाजपा को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। गोगोई के दो वाक्यों ने यह साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री की चयनात्मक कहानियों के सामने वास्तविक ऐतिहासिक दस्तावेज़ एक ऐसी रोशनी ला देते हैं जिसमें झूठ टिक नहीं पाता।
यह पूरा विवाद तब खड़ा किया गया जब देश अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी, महंगाई, चीन के साथ तनाव, PMO से जुड़े ऐप स्कैम और Epstein files जैसे गंभीर प्रश्नों का सामना कर रहा है। टिप्पणीकारों ने ठीक ही कहा कि यह मुद्दा असल समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए लाया गया है। राष्ट्रवाद की आड़ में विफलताओं को छिपाना मोदी सरकार की पुरानी रणनीति है, और हर बार इतिहास के एक ही पात्र—नेहरू—को निशाना बनाकर वे जनता को भ्रमित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जैसा प्रियंका गांधी ने कहा—“जितनी गालियाँ देना है, एक सूची बनाइए और एक दिन में दे दीजिए। इससे न महंगाई कम होगी, न बेरोज़गारी।”
अंततः सच यह है कि कांग्रेस ने 1886 से वंदे मातरम् को गाया, इसे राष्ट्रीय प्रतीक बनाया, और स्वतंत्रता के संघर्ष में अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। वहीं RSS न गीत अपनाने को तैयार हुई, न लड़ाई लड़ने को। वे अंग्रेजों से पेंशन लेते रहे और 52 साल तक अपने मुख्यालय पर तिरंगा तक नहीं फहराया। वही लोग आज राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रहे हैं—पर इतिहास उनसे बड़ा है, और जब भी वह सामने आता है, उनके दावों की परतें अपने आप उतर जाती हैं।




