महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 18 नवंबर 2025
भारत का लोकतंत्र तानाशाही की राह पर
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूरे देश को झकझोर दिया है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा बड़ा राजनीतिक तूफान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बयान ने खड़ा कर दिया है। एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया, जबकि महागठबंधन 35 पर सिमट गया और कांग्रेस महज़ 6 सीटें पाकर ध्वस्त हो गई। इस अप्रत्याशित एकतरफा नतीजे ने तभी से सवालों को जन्म दिया, लेकिन दिग्विजय सिंह ने जो कहा, वह अब भारतीय राजनीति को एक नए और विस्फोटक मोड़ पर ले आया है। उन्होंने साफ शब्दों में दावा किया कि “बिहार चुनाव के नतीजे उत्तर कोरिया, चीन और रूस जैसे तानाशाही देशों में होने वाले चुनावों से भी बदतर हैं—जहाँ हर वोट एक ही पार्टी को जाता है और चुनाव महज़ एक प्रायोजित तमाशा बनकर रह जाता है।” यह वह बयान था जिसने भाजपा, चुनाव आयोग और सुरक्षा एजेंसियों की विश्वसनीयता पर सीधा हमला बोल दिया और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया।
चुनाव आयोग ने विपक्षी समर्थकों को सुनियोजित तरीके से हटाया
दिग्विजय सिंह ने सिर्फ़ राजनीतिक बयान नहीं दिया, बल्कि आधिकारिक आँकड़ों का हवाला देते हुए चुनाव आयोग पर सीधे-सीधे “साजिश” का आरोप लगाया। उनके अनुसार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान 62 लाख वोटरों के नाम लिस्ट से हटाए गए और 20 लाख नए नाम जोड़े गए। यह फेरबदल इतना असामान्य और इतना भारी था कि इससे चुनावी मैदान अपने आप ही एकतरफा हो गया। सिंह ने कहा कि “आधार से पासपोर्ट बनता है, बैंक खाता खुलता है, राशन कार्ड अपडेट होता है, तो वोटर लिस्ट में आधार लिंकिंग क्यों नहीं की जाती? यह जानबूझकर छोड़ा गया एक छेद है ताकि जरूरत पड़ने पर विपक्षी वोटरों को अदृश्य किया जा सके।” उन्होंने चुनाव आयोग पर इस पूरी प्रक्रिया को छुपाने का आरोप लगाया और इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए “सीधा खतरा” बताया। अगर 62 लाख वोटर गायब हैं, तो इस चुनाव की वैधता किस आधार पर खड़ी है?
जब तक 100% VVPAT काउंटिंग नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र असुरक्षित रहेगा’
दिग्विजय सिंह ने यह भी कहा कि ईवीएम पर भरोसा नहीं किया जा सकता और भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में बैलेट पेपर या 100% VVPAT काउंटिंग ही इस शक को दूर कर सकती है। वे बोले, “जब एक ही गठबंधन 243 में से 202 सीटें जीत ले, जबकि जमीन पर माहौल पूरी तरह उल्टा था, तो यह ईवीएम का चमत्कार नहीं तो क्या है?” उन्होंने कहा कि दुनिया के लोकतांत्रिक देश ईवीएम का इस्तेमाल नहीं करते, फिर भारत में इसे पूजनीय क्यों माना जा रहा है? कांग्रेस नेता ने चेतावनी दी कि “अगर चुनाव आयोग ने पारदर्शिता नहीं दिखाई, तो आने वाले वर्षों में भारत की चुनाव प्रणाली उत्तर कोरिया जैसी हो जाएगी—जहाँ न जनता मायने रखती है, न वोट, न लोकतंत्र।”
कांग्रेस अंदर से उथली, BJP ने जवाबी हमला बोला—“हार की बौखलाहट और लोकतंत्र का अपमान”
दिग्विजय के इस बयान ने कांग्रेस के भीतर खौफ और बेचैनी दोनों पैदा कर दिए हैं। पार्टी के अंदर कई नेता पहले ही नतीजों को लेकर आक्रोश में हैं, और अब यह बयान उनकी निराशा को और भड़का रहा है। दूसरी तरफ भाजपा ने पूरे बयान को “हार की कुंठा” और “भारत की चुनावी संस्थाओं का अपमान” बताया है। भाजपा प्रवक्ता ने पलटवार करते हुए कहा, “दिग्विजय सिंह हमेशा विवादित बयान देते हैं—कभी सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाते हैं, कभी भगवान राम पर टिप्पणी करते हैं, अब चुनाव आयोग को उत्तर कोरिया बता रहे हैं। कांग्रेस हार स्वीकार नहीं कर पा रही है।”
दिलचस्प बात यह है कि रॉबर्ट वाड्रा ने भी दिग्विजय के सुर में सुर मिलाते हुए नतीजों को “अनफेयर” कहा और दोबारा चुनाव कराने की मांग की। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व टीम खुद इस हार से गहराई तक हिल चुकी है।
क्या यह वाकई ‘उत्तर कोरिया मॉडल चुनाव’ था या विपक्ष की हताशा? देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की ओर
दिग्विजय सिंह के बयान ने अब यह सवाल देश के सामने खड़ा कर दिया है कि क्या बिहार चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी थी, या इसमें वोटर लिस्ट, ईवीएम, और चुनाव आयोग की भूमिका संदिग्ध रही? क्या यह महज चुनावी हार का ग़ुस्सा है या वास्तव में लोकतंत्र के मूल ढांचे पर चोट? यदि 62 लाख वोटरों के नाम वाकई हटाए गए हैं, तो क्या चुनाव आयोग इसकी पूरी जांच करेगा? क्या सुप्रीम कोर्ट इस मामले को स्वतः संज्ञान में लेगा? क्या ईवीएम पर नई बहस शुरू होगी?
जो भी हो, इतना तय है कि यह तूफान अब थमने वाला नहीं है। बिहार की लड़ाई भले खत्म हो गई हो, लेकिन लोकतंत्र की लड़ाई अब पूरे देश में शुरू हो चुकी है। दिग्विजय सिंह के इस विस्फोटक बयान ने राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है—जहाँ अब सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि चुनाव की विश्वसनीयता ही सवालों के घेरे में है।




