ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई/ नई दिल्ली | 22 मार्च 2026
सिनेमा कभी समाज का आईना कहा जाता था, लेकिन आज वही सिनेमा कई बार समाज को एक तय दिशा में मोड़ने का औजार भी बनता दिख रहा है। धुरंधर-2 इसी बहस के केंद्र में खड़ी है। यह फिल्म सिर्फ एक एक्शन-थ्रिलर नहीं रह गई, बल्कि एक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी है—और यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है: क्या हम फिल्म देख रहे हैं या हमें एक कहानी “दिखाई” जा रही है? फिल्म की चमक-दमक, बड़े सितारे और देशभक्ति का ओवरडोज़ दर्शकों को आकर्षित जरूर करता है, लेकिन जैसे ही परतें खुलती हैं, कहानी के भीतर कई असहज सवाल खड़े होने लगते हैं। सबसे बड़ा विवाद उस किरदार को लेकर है, जिसे स्पष्ट रूप से एक वास्तविक राजनीतिक – आपराधिक व्यक्ति से प्रेरित माना जा रहा है, और उसे विदेशी खुफिया एजेंसी से जोड़कर दिखाया गया है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ “क्रिएटिव लिबर्टी” है, या फिर एक तय नैरेटिव को स्थापित करने की कोशिश?
यहां सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है—एक तरफ फिल्म में उसी किरदार को देशद्रोही और आतंकी नेटवर्क से जुड़ा दिखाया जाता है, वहीं दूसरी तरफ उसी व्यक्ति के निधन पर देश की संसद में श्रद्धांजलि दी जाती है। संसद में मौन रखना कोई साधारण प्रक्रिया नहीं होती; यह संवैधानिक गरिमा का प्रतीक है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी संस्थाएं अनजान थीं, या फिर सिनेमा एक अलग ही “सच” गढ़ रहा है?
15 अप्रैल 2023 की वह घटना, जिसे पूरा देश लाइव देख रहा था—पुलिस कस्टडी में हुई हत्या—आज भी अनुत्तरित सवालों से घिरी हुई है। इतनी भारी सुरक्षा के बावजूद हमलावरों का मीडिया के भेष में आना, गोली चलाना और फिर आत्मसमर्पण कर देना—यह सब किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसा जरूर लगता है, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा गंभीर थी। धुरंधर-2 इस पूरे प्रकरण को बेहद सरल बनाकर “अंत” की तरह पेश करती है, जबकि असल में यह कई संस्थागत सवालों की शुरुआत थी।
फिल्म की टाइमलाइन और तथ्यों को लेकर भी गंभीर आपत्तियां उठ रही हैं। अलग-अलग समय पर हुई घटनाओं और व्यक्तियों को एक साथ जोड़कर दिखाना, पुराने विजुअल्स और छवियों को दोहराना, और जटिल आर्थिक व राजनीतिक मुद्दों को एकतरफा तरीके से पेश करना—ये सब दर्शकों के मन में भ्रम पैदा करते हैं। यह कहना आसान है कि “फिल्म है, ड्रामा है”, लेकिन जब वही फिल्म वास्तविक घटनाओं और व्यक्तियों से प्रेरणा लेकर बनाई जाती है, तब जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसी फिल्मों का असर सिर्फ बॉक्स ऑफिस तक सीमित नहीं रहता। यह लोगों की सोच, धारणा और सामाजिक रिश्तों को भी प्रभावित करता है। जब किसी खास समुदाय, व्यक्ति या विचारधारा को बार-बार एक ही फ्रेम में दिखाया जाता है, तो वह धीरे-धीरे “सच” जैसा लगने लगता है—चाहे वह अधूरा ही क्यों न हो। यही वह जगह है जहां सिनेमा मनोरंजन से आगे बढ़कर “नैरेटिव बिल्डिंग” का माध्यम बन जाता है।
यह भी सच है कि सिनेमा को पूरी तरह तथ्यों की किताब नहीं बनाया जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सिनेमा के नाम पर आधे-अधूरे या संदिग्ध तथ्यों को स्थापित करना खतरनाक हो सकता है। सवाल किसी एक फिल्म या एक निर्देशक का नहीं है—सवाल उस ट्रेंड का है, जिसमें कहानियों के जरिए जनमत को प्रभावित करने की कोशिशें तेज होती दिख रही हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि दर्शक सिर्फ तालियां न बजाएं, बल्कि सवाल भी पूछें। फिल्म देखें, लेकिन आंखें खुली रखकर देखें। क्योंकि अगर हम हर कहानी को बिना परखे “सच” मान लेंगे, तो कल सच और कल्पना के बीच की रेखा पूरी तरह मिट जाएगी।
धुरंधर-2 अच्छी फिल्म है या खराब—यह बहस अलग हो सकती है। लेकिन यह फिल्म एक जरूरी बहस जरूर खड़ी करती है: क्या हम सिनेमा देख रहे हैं, या सिनेमा हमें देख रहा है—और हमारी सोच को दिशा दे रहा है?
सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट्स ने इस विवाद को और तीखा बना दिया है और फिल्म की विश्वसनीयता पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं। कई यूजर्स यह दावा कर रहे हैं कि फिल्म में अलग-अलग समय पर हुई घटनाओं और व्यक्तियों को एक साथ जोड़कर दिखाया गया है—खास तौर पर इलियास कश्मीरी (जिसकी मौत 2011 में हो चुकी) और अतीक अहमद (2023) के बीच कथित बातचीत दिखाना। आलोचकों का कहना है कि यह न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से संदिग्ध है, बल्कि दर्शकों को भ्रमित करने वाला भी है। इसी के साथ एक और बड़ा मुद्दा यह उठाया गया है कि कुख्यात अंडरवर्ल्ड डॉन की वही पुरानी तस्वीर फिल्म में दिखाई गई है, जिसे भारतीय मीडिया पिछले दो दशकों से बार-बार दिखाता आ रहा है। सवाल यह है कि क्या यह शोध की कमी है या फिर एक तय छवि को दोहराकर उसे “सत्य” के रूप में स्थापित करने की कोशिश?
फिल्म के कुछ दृश्यों में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े किरदारों और पदों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया पर यह आरोप सामने आया है कि एक सीन में अजित डोभाल जैसे शीर्ष सुरक्षा अधिकारी के स्तर से सीधे राज्य के पुलिस प्रमुख (DGP) को निर्देश देते दिखाया गया, और उस संदर्भ में प्रशांत कुमार जैसे नामों को उस समय की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़कर पेश किया गया, जबकि आधिकारिक रिकॉर्ड में उस अवधि के पदाधिकारी अलग थे। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की प्रस्तुति न केवल तथ्यात्मक भ्रम पैदा करती है, बल्कि संस्थागत प्रक्रियाओं और भूमिकाओं की समझ को भी तोड़-मरोड़ देती है।
वहीं दूसरी तरफ 15 अप्रैल 2023 की घटना को लेकर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं, जब पुलिस कस्टडी में मीडिया कैमरों के सामने हत्या हुई थी। पोस्ट्स में यह पूछा जा रहा है कि इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद यह चूक कैसे हुई, क्या खुफिया एजेंसियों के पास पहले से कोई जानकारी थी, और आखिर जिम्मेदारी किस स्तर पर तय हुई। आलोचकों का आरोप है कि फिल्म इस पूरे घटनाक्रम को बेहद सरल बनाकर एक ही निष्कर्ष में समेट देती है, जिससे असल सवालों और जवाबदेही की जरूरत को दरकिनार कर दिया जाता है। इसी के साथ यह विरोधाभास भी बहस का हिस्सा बना हुआ है कि जिस व्यक्ति को फिल्म में गंभीर आरोपों के साथ पेश किया गया, उसी को संसद में श्रद्धांजलि दी गई—और यही टकराव इस पूरे विवाद को और गहरा और जटिल बनाता है।




