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धामी का “नकल जिहाद” बयान: बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ को धर्म से जोड़ने की सियासत

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देहरादून 24 सितंबर 2024

उत्तराखंड में भर्ती परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक का मामला लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में आयोजित UKSSSC परीक्षा शुरू होने के कुछ मिनटों बाद ही उसके तीन पन्ने सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। पुलिस ने जांच में मुख्य आरोपी खालिद मलिक को गिरफ्तार किया है और उसके परिवार के अन्य सदस्यों से पूछताछ जारी है। इस घोटाले से नाराज अभ्यर्थियों ने देहरादून में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया।

लेकिन इस गंभीर मुद्दे पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जिम्मेदारी तय करने और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की बजाय इसे “नकल जिहाद” कहकर नया विवाद खड़ा कर दिया। धामी का यह बयान दर्शाता है कि बीजेपी नेता किसी भी समस्या को धार्मिक रंग देकर समाज में विभाजन की राजनीति करने लगते हैं। कभी “लव जिहाद”, कभी “जमीन जिहाद”, कभी “हलाल जिहाद”, कभी “व्यापार जिहाद”—और अब “नकल जिहाद”।

बीजेपी शासनकाल में पेपर लीक का काला इतिहास

धामी जिस ‘जिहाद’ का शोर मचा रहे हैं, असलियत यह है कि बीजेपी के शासनकाल में सबसे ज्यादा परीक्षाएँ रद्द हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों में करीब 80 बार पेपर लीक होने या अनियमितताओं के चलते परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं। छोटी परीक्षाओं से लेकर बड़े राष्ट्रीय स्तर के एग्जाम तक—सब प्रभावित हुए। राजस्थान, उत्तराखंड, यूपी, मध्यप्रदेश और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं जैसे NEET-2024 तक में बड़े स्तर पर गड़बड़ियाँ सामने आईं।

इन घटनाओं ने मेहनती छात्रों के भविष्य पर कुठाराघात किया है। हजारों-लाखों अभ्यर्थियों की सालों की मेहनत बर्बाद हुई है और सरकारी नौकरियों की पूरी प्रक्रिया संदिग्ध हो गई है।

बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़

  1. कैरियर का नुकसान — मेहनती छात्र हताश होते हैं क्योंकि उनकी ईमानदारी और लगन का कोई मोल नहीं रह जाता।
  1. विश्वास का संकट — अभ्यर्थियों और जनता का भरोसा सरकारी तंत्र पर से उठता जा रहा है।
  1. भ्रष्टाचार को बढ़ावा — पैसे और राजनीतिक संपर्क वाले लोग फायदा उठाते हैं, जबकि गरीब व साधारण पृष्ठभूमि के छात्र सबसे ज्यादा नुकसान झेलते हैं।
  1. सांप्रदायिक ज़हर — “नकल जिहाद” जैसे शब्द शिक्षा जैसी पवित्र प्रक्रिया को भी सांप्रदायिक राजनीति से दूषित कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री धामी और बीजेपी को यह समझना होगा कि पेपर लीक कोई “जिहाद” नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार का नतीजा है। बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ को धार्मिक जुमलों में ढालकर छुपाया नहीं जा सकता। जरूरत है कि दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो और परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाया जाए। वरना यह सारा खेल सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाएगा और देश का भविष्य अंधकार में धकेल दिया जाएगा।

 

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