राष्ट्रीय ABC NATIONAL NEWS | देहरादून/ दिल्ली | 30 मार्च 2026
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बार फिर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का सबसे घिनौना नमूना पेश करते हुए राज्य मदरसा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त करने का ऐलान कर दिया है। 1 जुलाई 2026 से सभी मदरसों में राज्य शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम थोपने और मदरसा बोर्ड को खत्म करने का यह फैसला मुस्लिम समुदाय की सदियों पुरानी शिक्षा व्यवस्था पर सीधा हमला है। धामी ने बिना किसी ठोस सबूत के मदरसों को ‘जिहादी सोच’ का अड्डा बताकर पूरे बोर्ड को खत्म करने का फैसला लिया है, जो साफ तौर पर अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
सीएम धामी ने कहा कि वे नहीं चाहते कि मदरसे ‘जिहादी सोच’ के केंद्र बनें और राज्य में अलगाववाद फैले। उन्होंने 250 से ज्यादा अवैध मदरसों पर पहले ही ताले लगाने का दावा किया, लेकिन असल में यह कार्रवाई लाखों गरीब मुस्लिम बच्चों की शिक्षा को निशाना बना रही है। धामी सरकार का तर्क है कि अब मदरसे मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि इस फैसले से मुस्लिम समुदाय की अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह कुचल दिया जा रहा है। संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षा संस्थाएं स्थापित करने और चलाने का मौलिक अधिकार है, लेकिन धामी ने मदरसा बोर्ड 2016 एक्ट और अरबी-फारसी मदरसा मान्यता नियम 2019 को रद्द करके इस अधिकार को छीन लिया है।
यह फैसला बीजेपी-आरएसएस की लंबे समय से चली आ रही ‘मुस्लिम विरोधी’ और ‘ध्रुवीकरण’ वाली राजनीति का हिस्सा है। पहले लैंड जिहाद के नाम पर मुस्लिमों की जमीनें छीनी गईं, मजारें तोड़ी गईं, फिर लव जिहाद और स्पिट जिहाद जैसे बयानों से समाज को बांटा गया, और अब मदरसा बोर्ड को ‘जिहादी अड्डा’ बताकर खत्म करने की बारी आई है। धामी ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि जब ऐसे केंद्रों पर कार्रवाई होती है तो उनका पेट दुखता है, लेकिन असल में यह बयान खुद उनकी सांप्रदायिक मानसिकता को उजागर करता है। उत्तराखंड को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की कोशिश में मुस्लिम संस्थाओं को एक-एक कर निशाने पर लिया जा रहा है, जिससे देवभूमि की साझा संस्कृति और सामाजिक सद्भाव को गहरा खतरा पैदा हो रहा है।
मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों ने इस फैसले की तीखी निंदा की है। उन्होंने कहा कि शिक्षा सुधार की आड़ में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। सदियों से चल रहे मदरसों में लाखों बच्चे पढ़ते हैं, जो मुख्य रूप से गरीब और पिछड़े तबके से आते हैं। इन्हें अचानक ‘अलगाववादी’ और ‘जिहादी’ ठहराकर उनकी शिक्षा व्यवस्था को खत्म करना न सिर्फ असंवैधानिक है बल्कि मानवीय अधिकारों का भी उल्लंघन है। आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या बिना किसी सर्वे या ठोस आंकड़ों के पूरे बोर्ड को खत्म करना शिक्षा का सुधार है या सिर्फ वोट बैंक की सस्ती सांप्रदायिक राजनीति? क्या मुख्यधारा में लाने का मतलब यही है कि मुस्लिमों की अपनी संस्थाओं को कुचल दिया जाए?
धामी सरकार दावा कर रही है कि यह कदम NEP 2020 के अनुरूप है और बच्चों को आधुनिक शिक्षा देगा, लेकिन हकीकत यह है कि इस फैसले से मुस्लिम समुदाय में गहरा गुस्सा और असुरक्षा का माहौल बन गया है। जब देशभर में हजारों मदरसे चल रहे हैं और वे अपनी परंपरा के अनुसार शिक्षा देते हैं, तो उत्तराखंड में उन्हें ‘जिहादी फैक्ट्री’ बताना सिर्फ नफरत फैलाने का काम है। यह फैसला साबित करता है कि पुष्कर सिंह धामी की सरकार अल्पसंख्यक विरोधी एजेंडे पर चल रही है और समाज को बांटकर सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है।
उत्तराखंड के इस कदम से पूरे देश में अल्पसंख्यक समुदाय सतर्क हो गया है। क्या ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा सिर्फ चुनावी जुमला था? क्या देवभूमि अब सिर्फ एक समुदाय के लिए सुरक्षित रहेगी और दूसरे को डराया जाएगा? पुष्कर सिंह धामी का यह फैसला न सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में बल्कि सामाजिक सद्भाव पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। समय बताएगा कि यह ‘सुधार’ था या फिर मुस्लिमों के खिलाफ खुला सांप्रदायिक हमला, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि उत्तराखंड में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अब सरकारी नीति बन चुकी है और धामी सरकार मुस्लिम समुदाय को लगातार निशाना बना रही है।




