देहरादून 29 सितंबर 2025
देहरादून की सड़कों पर गूंजते नारों ने साफ कर दिया कि उत्तराखंड का युवा अब सरकार की चालें समझ चुका है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पेपर लीक कांड को “नकल जिहाद” का नाम देकर इसे हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा बनाने की कोशिश की, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया। बेरोज़गार युवाओं का गुस्सा किसी धार्मिक बहस में नहीं भटका — बल्कि और तेज़ी से सरकार पर फूटा। परेड ग्राउंड से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही आवाज़ उठी — “हमें धर्म नहीं, न्याय चाहिए। हमें नकल माफिया के खिलाफ कार्रवाई चाहिए, परीक्षा पारदर्शी चाहिए।” यह गुस्सा बताता है कि नौजवान अब धर्म के नाम पर भटकने वाले नहीं हैं और धामी सरकार की राजनीति पर सीधा सवाल खड़ा कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस बार इसे “नकल जिहाद” कहकर धार्मिक रंग देने की कोशिश की। लेकिन यह कोशिश बुरी तरह नाकाम हो गई। क्योंकि यहाँ बात किसी धर्म की नहीं, भ्रष्टाचार, सिस्टम की नाकामी और युवाओं की उम्मीदों के टूटने की है। बेरोज़गार युवाओं ने साफ कह दिया है कि यह हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा नहीं है, बल्कि सरकार की जवाबदेही का मामला है।
धामी सरकार को समझना होगा कि धर्म के नाम पर ध्यान भटकाने की राजनीति अब नहीं चलेगी। युवाओं का गुस्सा इस बार केवल सड़क तक सीमित नहीं रहेगा, यह गुस्सा मतदान केंद्र तक जाएगा और सत्ता के गलियारों को हिला देगा। बेरोज़गार नौजवान अब बहानों और खोखले भाषणों से संतुष्ट नहीं होंगे। वे साफ और पारदर्शी भर्ती चाहते हैं, दोषियों को सज़ा चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि सरकार इस राज्य को पेपर माफियाओं का अड्डा बनने से रोके।
आज यह आंदोलन सिर्फ एक पेपर लीक का आंदोलन नहीं है, यह पूरे उत्तराखंड के युवाओं का भविष्य बचाने की जंग है। अगर सरकार ने अभी भी “नकल जिहाद” जैसे बयान देकर मुद्दा भटकाने की कोशिश की, तो यह गुस्सा और भड़केगा। यह समय धर्म का नाम लेने का नहीं, बल्कि ईमानदारी से व्यवस्था सुधारने का है। वरना धामी सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि बेरोज़गारों की यह आवाज़ आने वाले चुनावों में निर्णायक साबित होगी।




