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विकास या विनाश? भारत में पेड़ों की बलि और पर्यावरण का अंतिम संस्कार

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अखलाक अहमद | नई दिल्ली 19 नवंबर 2025

भारत आज जिस तेज़ी से विकास के नाम पर पेड़ों को काट रहा है, वह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि नीतिगत संवेदनहीनता का भी खुला प्रमाण है। कभी कॉर्पोरेट विस्तार के लिए, कभी पीएम की रैलियों के लिए मैदान बनाने के नाम पर, कभी हाईवे, ब्रिज और कंक्रीट के जंगलों के लिए हजारों पेड़ काट दिए जाते हैं—और अब नाशिक में साधुओं के अस्थायी ठहराव के लिए 1,700 पेड़ों पर आरी चलाने की तैयारी हो रही है। सवाल यह है कि क्या भारत का विकास मॉडल पेड़ों की लाशों पर खड़ा होगा? क्या यह वही सभ्यता है जो प्रकृति को ‘माता’ कहती आई है? विडंबना यह है कि हर बार दावा किया जाता है कि “हम क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण करेंगे”—लेकिन यह सच्चाई सभी जानते हैं कि 50 साल पुराने पेड़ का ‘मुआवजा’ एक पौधा कभी नहीं हो सकता।

आज भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शुमार है। दिल्ली हो या मुंबई, पटना हो या लखनऊ—हर शहर दम घुटने की कगार पर है। AQI रोज़ मौत का आंकड़ा बताता है, अस्पताल सांस के मरीजों से भरे पड़े हैं, बच्चे अस्थमा लेकर बड़े हो रहे हैं। ऐसे में पेड़ों को काटने की नीतियां किस सोच की उपज हैं? क्या यह पर्यावरण मंत्रालय की विफलता नहीं कि हर प्रोजेक्ट में पर्यावरण को बस ‘औपचारिकता’ माना जाता है? कभी अडानी के कारोबार के लिए हजारों पेड़ काटे जाते हैं, कभी राजनीतिक रैलियों के लिए, कभी नए शहरों के नाम पर कंक्रीट की दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं। यह नीतियां नहीं, बल्कि प्रकृति के खिलाफ खुले युद्ध जैसी हैं—जहां हर जीत में मानवता हारती है।

भारत जैसे देश में, जहां गर्मी हर साल नया रिकॉर्ड तोड़ रही है, जहां नदियां सूख रही हैं, जहां ग्लेशियर पिघल रहे हैं और जहां किसान पानी के लिए आसमान ताक रहे हैं—वहां पेड़ काटना केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं बल्कि अस्तित्व का संकट है। लेकिन इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि सरकारें इस संकट को देखकर भी आँखें मूंदे बैठी हैं। किसी पुल के लिए पेड़ कटते हैं, किसी फ्लाईओवर के लिए, किसी कारखाने के लिए—और हर बार जनता को बहलाने के लिए कहा जाता है: “हर पेड़ के बदले पाँच पौधे लगाए जाएंगे।” यह छल है, क्योंकि 50 साल में बने जंगल को 50 पौधे कभी नहीं बना सकते।

अगर आज हमने पेड़ों को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ी, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। यह सवाल केवल नाशिक का नहीं, बल्कि पूरे देश का है—क्या यह विकास मॉडल सही है? क्या यह वही ‘न्यू इंडिया’ है जहां लोग सांस भी खरीदनी पड़ेगी? भारत को एक ऐसी राष्ट्रीय नीति चाहिए जो विकास और पर्यावरण को दुश्मन नहीं, बल्कि सहयोगी माने। क्योंकि वास्तविक विकास वही है जिसमें सड़कें भी हों और पेड़ भी, साधुग्राम भी बने और नदियों का प्रवाह भी बचे, पुल भी खड़े हों और हवा भी सांस लेने लायक रहे। पेड़ काटकर कभी कोई देश मजबूत नहीं बना—और भारत भी अपवाद नहीं होगा।

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