स्मृति मिश्रा । काशी 27 नवंबर 2025
धर्मनगरी काशी—जिसे भारत की आध्यात्मिक राजधानी कहा जाता है—इन दिनों सड़क चौड़ीकरण के नाम पर चल रहे ध्वस्तीकरण कार्य को लेकर भारी तनाव, विरोध और दर्द से गुजर रही है। वाराणसी की दालमंडी गली, जो सदियों से अपनी जीवंत बाज़ार संस्कृति, पान, गलियों की अनूठी पहचान और व्यापारिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध रही है, अब हथौड़ों और बुलडोज़रों की गड़गड़ाहट से थर्रा रही है। वाराणसी नगर निगम (VDA) द्वारा इस गली को “मॉडल सड़क” बनाने की योजना के तहत 187 मकानों और दुकानों को तोड़े जाने की घोषणा ने स्थानीय व्यापारियों, मकान मालिकों और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने वालों में गहरा रोष पैदा कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस परियोजना का शिलान्यास कुछ महीनों पहले किया गया था, और अब इसके नाम पर जिस तरह से पुराने घर, तंग गलियां, और ऐतिहासिक बाजार ढहाए जा रहे हैं, उसने पूरे शहर में असंतोष की लहर दौड़ा दी है।
दालमंडी काशी विश्वनाथ मंदिर के बेहद करीब स्थित है और इस इलाके को तोड़कर उसे एक 650 मीटर लंबी और 60 फीट चौड़ी मॉडल सड़क में बदला जाना है। सरकार का दावा है कि इससे मंदिर तक पहुंच आसान होगी, भीड़ कम होगी और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन सैकड़ों दुकानदारों के लिए यह फैसला उनके जीवन भर की पूंजी, उनकी दुकानें, और सदियों पुराना व्यापार खोने का सवाल है। अनेक दुकानदार पीढ़ियों से यहां व्यापार कर रहे हैं—साड़ियों, बनारसी कपड़ों, शादी के परिधानों और कढ़ाई वाले कामों की जिस दालमंडी ने पूरे देश में ख्याति अर्जित की है, वही आज ख़तरे में है। लोगों का कहना है कि मुआवज़ा दिया जा रहा है, पर व्यापार की उम्र, विश्वसनीयता, गांवों–शहरों से आने वाले पुराने ग्राहक, और इस बाजार की पहचान का मोल क्या कोई रकम चुका सकती है?
विरोध का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस क्षेत्र में अनेक दुकानें किराए पर चल रही हैं—मालिकों को मुआवजा मिल रहा है, लेकिन वास्तविक दुकानदारों के हाथ खाली हैं। वे वर्षों से चल रही अपनी रोज़ी–रोटी खो देंगे, लेकिन उनकी भरपाई का कोई प्रावधान नहीं है। कई दुकानदारों ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा है कि “दुकान जहां है, वही हमारी कमाई है। हमें शहर से बाहर भेजकर हमारा व्यापार खत्म कर दिया जाएगा।” कई परिवार सड़क पर उतर आए हैं। महिलाओं ने दो दिन पहले बुलडोज़र रोक दिए, जिसके बाद प्रशासन को पीछे हटना पड़ा और कई लोगों पर मुकदमे भी दर्ज हुए।
इस परियोजना का प्रशासनिक पक्ष भी कम विवादित नहीं है। VDA सचिव डॉ. वेदप्रकाश मिश्र के अनुसार, 12 अवैध भवनों को पहले नोटिस दिया गया था और फिर विशुद्ध कानूनी प्रक्रिया के तहत ध्वस्तीकरण किया जा रहा है। लाउडस्पीकर से मुनादी, नोटिस चस्पा, और समय सीमा तय करने के बाद कार्रवाई प्रारंभ की गई। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन “कानून” की आड़ में सिर्फ आदेश लागू कर रहा है, पर लोगों की भावनाओं, व्यापारिक भविष्य और सांस्कृतिक धरोहर को समझने की ज़रा भी कोशिश नहीं कर रहा।
वाराणसी की दालमंडी सिर्फ एक बाज़ार नहीं, बल्कि सामाजिक–सांस्कृतिक इतिहास का एक अनमोल अध्याय है। वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह बताते हैं कि यह स्थान कभी पूर्वांचल की सबसे बड़ी दाल मंडी हुआ करता था। व्यापारी हफ्तों तक यहां रहते थे, और उसी दौरान यहां तवायफों के कोठों की परंपरा फलने–फूलने लगी। घुंघरुओं की छनक, ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती जैसी गायकी का उन्नयन, और संगीत घरानों की जड़ें—इन सबने दालमंडी को एक सांस्कृतिक खजाना बनाया। मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्ला खान भी यहां के संगीत जगत से प्रभावित रहे थे। स्वतंत्रता आंदोलन में कई तवायफों ने क्रांतिकारियों को शरण दी, आर्थिक सहयोग किया और उस दौर में कला एवं संघर्ष दोनों के संगम का केंद्र बनीं।
स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि सरकार विकास की बात कर रही है, लेकिन वह विकास तब कैसा होगा जब शहर की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक बनावट ही ढहा दी जाए? समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे “बीजेपी सरकार की संकीर्ण सोच और छोटी राजनीति” बताया है और कहा है कि लोगों को डरा–धमका कर विस्थापित किया जा रहा है। कई व्यापारी चाहते हैं कि पहले उन्हें पास के क्षेत्र में सुरक्षित रूप से बसाया जाए, उसके बाद ध्वस्तीकरण हो—लेकिन प्रशासन फिलहाल मौजूदा योजना से हटने को तैयार नहीं दिखता।
वाराणसी की दालमंडी का संघर्ष आज भारत के कई शहरों में हो रहे “विकास बनाम विरासत” की बहस का प्रतीक बन चुका है। एक तरफ सुविधाओं पर आधारित आधुनिक शहरीकरण है, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी संस्कृति, कला, व्यापार और स्थानीय पहचान को बचाने की जद्दोजहद। काशी को बचाने की लड़ाई सिर्फ दालमंडी की दुकानों तक सीमित नहीं—यह लड़ाई उस धरोहर की भी है जिसे दुनिया काशी की आत्मा के रूप में पहचानती है।




