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27 एकड़ का दिल्ली का “जिमखाना क्लब” और महज़ 409 रुपये किराया! अब केंद्र ने क्यों छेड़ी बड़ी कानूनी लड़ाई?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 मई 2026

दिल्ली का प्रतिष्ठित जिमखाना क्लब इन दिनों बड़े कानूनी और राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गया है। वजह है — राजधानी के सबसे पॉश इलाके लुटियंस दिल्ली में फैली 27.3 एकड़ जमीन और उसका बेहद मामूली किराया। जिस जमीन की आज बाजार कीमत हजारों करोड़ रुपये मानी जाती है, उसका सालाना किराया साल 2023 तक सिर्फ 409.50 रुपये था। अब केंद्र सरकार ने इस जमीन को खाली कराने और करोड़ों रुपये का संशोधित किराया वसूलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिसके खिलाफ मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गया है।

दरअसल, दिल्ली जिमखाना क्लब 1927 से 2, सफदरजंग रोड स्थित इस विशाल परिसर का इस्तेमाल कर रहा है। यह जमीन एक परपेचुअल लीज़ के तहत दी गई थी, जिसमें प्रति एकड़ सालाना किराया सिर्फ 15 रुपये तय किया गया था। इसी हिसाब से पूरे परिसर का किराया 409.50 रुपये बनता था। दशकों तक यही व्यवस्था चलती रही। लेकिन अब केंद्र सरकार का कहना है कि इतने बड़े और प्रीमियम सरकारी भूखंड का किराया पुराने दौर के हिसाब से नहीं चल सकता।

विवाद तब और बढ़ गया जब हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स मंत्रालय ने 2023 में अचानक जमीन का किराया संशोधित करते हुए इसे करोड़ों रुपये में बदल दिया। पहले करीब 4.10 करोड़ रुपये सालाना किराया तय किया गया, फिर 2026 में यह रकम बढ़ाकर लगभग 47.59 करोड़ रुपये तक पहुंचा दी गई। क्लब का आरोप है कि यह बढ़ोतरी अचानक, मनमानी और “10,000 गुना” ज्यादा है। क्लब ने अदालत में कहा कि उसे पर्याप्त सुनवाई का मौका भी नहीं दिया गया।

केंद्र सरकार का दावा है कि क्लब परिसर में कई तरह के अनधिकृत निर्माण, अतिक्रमण और नियमों के उल्लंघन पाए गए हैं। मंत्रालय ने यह भी आरोप लगाया कि परिसर के कुछ हिस्सों का व्यावसायिक इस्तेमाल और सबलेटिंग की गई। सरकार का कहना है कि यह सिर्फ किराए का मामला नहीं, बल्कि सरकारी जमीन के इस्तेमाल और नियमों के पालन का मुद्दा है। इसी आधार पर क्लब को 5 जून तक परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया है।

अब यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच चुका है। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने क्लब की तरफ से अदालत में तत्काल सुनवाई की मांग की है। अदालत 26 मई को इस पूरे विवाद पर सुनवाई करेगी। माना जा रहा है कि यह मामला सिर्फ एक क्लब तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिल्ली की दूसरी पुरानी लीज़ वाली संस्थाओं और सरकारी संपत्तियों पर भी इसका असर पड़ सकता है।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी इस विवाद की काफी चर्चा है। कुछ लोग इसे सरकारी जमीनों के “री-क्लेमेशन” और पारदर्शिता की कार्रवाई बता रहे हैं, जबकि कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर दशकों तक इतनी प्रीमियम जमीन इतने कम किराए पर कैसे चलती रही। वहीं क्लब से जुड़े लोग इसे ऐतिहासिक संस्थाओं पर दबाव बनाने की कार्रवाई मान रहे हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिल्ली का यह ऐतिहासिक और एलीट क्लब अपनी जमीन बचा पाएगा, या फिर केंद्र सरकार की कार्रवाई राजधानी की सबसे चर्चित संपत्ति लड़ाइयों में से एक साबित होगी।

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