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दिल्ली में बेटियों का घटता आंकड़ा: क्या चोरी-छिपे हो रही है जेंडर टेस्टिंग और अबॉर्शन?

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नई दिल्ली 16 सितंबर 2025

 ताज़ा जनगणना और सरकार की रिपोर्ट्स से साफ है कि दिल्ली में बेटियों की संख्या में लगातार गिरावट जारी है। विशेषज्ञों और पुलिस कार्रवाई के केस में यह भी सामने आया है कि चोरी-छिपे जेंडर टेस्टिंग और अबॉर्शन की घटनाएं अब भी जारी हैं, जिससे समाज पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

रिपोर्ट के आंकड़े और गिरते लिंगानुपात

2024 में दिल्ली का लिंगानुपात घटकर 920 बेटियां प्रति 1000 लड़कों पर पहुँच गया है, जो राष्ट्रीय औसत 940 से काफी नीचे है। 2020 में यह अनुपात 933 था, जो हर साल गिरता जा रहा है: 929 (2022), 922 (2023), और अब महज 920। विशेषज्ञों के अनुसार, यह गिरावट केवल ग्रामीण या कम पढ़े-लिखे समाज तक सीमित नहीं है; शहरी और शिक्षित परिवारों में भी यही ट्रेंड देखा जा रहा है।

कानून मौजूद, लेकिन अपराध जारी

पीएनडीटी एक्ट 1994 के तहत भ्रूण का लिंग परीक्षण और उसके आधार पर गर्भपात अपराध है, बावजूद इसके 2025 में कई डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी चोरी-छिपे जेंडर टेस्टिंग और अवैध अबॉर्शन कराने में पकड़े गए। हाल ही में हुए छापों में दिल्ली-एनसीआर के क्लीनिक में आशा वर्कर और डॉक्टर की मिलीभगत सामने आई, जो 40,000-50,000 रुपये में लिंग परीक्षण कर रहे थे। न्यायालय ने भी सख्त टिप्पणी की है कि लिंग जांच आधारित गर्भपात समाज में लैंगिक असमानता और अपराध के लिए जिम्मेदार है और कानून के बेहतर इम्प्लीमेंटेशन की जरूरत है।

सामाजिक मानसिकता और बेटियों की अहमियत

विशेषज्ञों का कहना है कि लड़कों को प्राथमिकता देने वाली मानसिकता दिल्ली जैसे आधुनिक शहर में भी है। कई परिवार, चाहे वे पढ़े-लिखे हों या संपन्न, बेटी को आज भी “बोझ” समझते हैं। इसी सोच के कारण चोरी-छिपे जेंडर टेस्टिंग और अबॉर्शन की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे बेटियों का अस्तित्व संकट में है। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी कहा है कि लिंग-निर्धारित गर्भपात से लैंगिक भेदभाव गहरा रहा है।

तंत्र, प्रशासन और सरकार की विफलता

दिल्ली के स्वास्थ्य ढांचे और तकनीक के ऊँचे स्तर के बावजूद अवैध गतिविधियां जारी रहना तंत्र की विफलता दर्शाता है। अधिकारियों ने माना है कि दिल्ली में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट की कमी के कारण पैथोलॉजिकल लैब्स की निगरानी कमजोर है। कई बार प्रशासन की कार्रवाई केवल “कागज़ी” रह जाती है और जमीनी स्तर पर क्रैकडाउन की बजाय महज छिटपुट छापे होते हैं। विशेषज्ञ अरुण यादव (पूर्व निदेशक, हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन, MCD) ने कहा, “सिस्टम में सतत और सख्त कार्रवाई की जरूरत है, वरना हालात और बिगड़ सकते हैं।”

सामाजिक संतुलन पर खतरा: विशेषज्ञों की चेतावनी

डॉक्टर अरुण यादव और दिल्ली हाई कोर्ट की जज स्वर्ण कांत शर्मा ने चेताया है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो समाज में अपराध, असमानता और लैंगिक असंतुलन का संकट गहरा सकता है। यह केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं बल्कि पूरे समाज का है। लंबे समय में युवाओं के विवाह, समाज के संतुलन और अपराध की दुनिया पर इसका असर दिख सकता है।

आगे का रास्ता

  1. निगरानी एजेंसियों की सख्ती और टेक्नोलॉजी के जरिए पैथोलॉजिकल लैब्स पर नजर।
  1. अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर और डॉक्टरों पर लगातार छापेमारी और सजा।
  1. बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मुफ्त कानूनी सहायता और ऑनलाइन शिकायत की सुविधा।
  1. जन-जागरूकता अभियान और स्कूल- कॉलेज स्तर पर लैंगिक बराबरी पर शिक्षा।
  1. बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और पोषण को प्राथमिकता देना।

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