साजिद अली। कोलकाता 16 दिसंबर 2025
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की खामियों ने लोकतंत्र को एक अजीब और चौंकाने वाला दृश्य दिखा दिया। राज्य के एक तृणमूल कांग्रेस (TMC) पार्षद को जब यह पता चला कि चुनाव आयोग की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में उन्हें ‘मृत’ घोषित कर दिया गया है, तो उन्होंने विरोध का ऐसा तरीका चुना जिसने पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया। जिंदा पार्षद सीधे श्मशान घाट पहुंच गए और वहां खड़े होकर प्रतीकात्मक रूप से अपनी ही अंत्येष्टि करने की मांग कर दी। इस अनोखे विरोध ने न सिर्फ प्रशासन को हिला दिया, बल्कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
बताया जा रहा है कि संबंधित पार्षद जब नई ड्राफ्ट मतदाता सूची की जांच कर रहे थे, तभी उन्हें यह झटका लगा कि उनके नाम के सामने ‘मृत’ लिखा हुआ है। यानी कागज़ों में वे इस दुनिया से जा चुके थे, जबकि असल जिंदगी में वे न सिर्फ जीवित थे, बल्कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि के तौर पर सक्रिय रूप से काम भी कर रहे थे। इस गलती को महज तकनीकी चूक मानने से इनकार करते हुए पार्षद ने कहा कि अगर सिस्टम उन्हें मरा हुआ मान चुका है, तो फिर उसी सिस्टम के सामने यह दिखाना जरूरी है कि ऐसी गलतियों से लोकतंत्र की आत्मा कैसे घायल होती है।
श्मशान घाट में पार्षद का पहुंचना अपने आप में एक प्रतीकात्मक और व्यंग्यात्मक संदेश था। उन्होंने कहा कि जब वोटर लिस्ट में किसी जिंदा आदमी को मृत घोषित कर दिया जाता है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि मताधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था का ‘कत्ल’ है। उनका कहना था कि अगर आम नागरिकों के नाम भी इस तरह बिना जांच के काटे या बदल दिए जा रहे हैं, तो यह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सीधा हमला है। श्मशान घाट में उनकी मौजूदगी ने वहां मौजूद लोगों और मीडिया को भी हैरान कर दिया।
तृणमूल कांग्रेस ने इस पूरे मामले को चुनाव आयोग की लापरवाही करार देते हुए तीखा हमला बोला है। पार्टी का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में इस तरह की गंभीर गलतियां सामने आई हों। कई जगहों पर जिंदा लोगों को मृत दिखाया गया है, तो कहीं पात्र मतदाताओं के नाम गायब हैं। पार्टी नेताओं ने सवाल उठाया कि अगर एक निर्वाचित पार्षद का नाम ही इस तरह ‘मार’ दिया गया, तो आम और कमजोर तबके के मतदाताओं के साथ क्या हो रहा होगा?
वहीं प्रशासन की ओर से कहा गया है कि ड्राफ्ट लिस्ट में आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया है और सुधार किए जाएंगे। लेकिन आलोचकों का कहना है कि सुधार की बात हर बार बाद में आती है, जबकि गलती का असर पहले ही लोकतांत्रिक अधिकारों पर पड़ चुका होता है। पार्षद के श्मशान घाट पहुंचने की घटना ने इस पूरे मुद्दे को महज आंकड़ों और फॉर्म तक सीमित न रखकर एक जीवंत राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया है।
कुल मिलाकर यह घटना एक रोचक लेकिन गंभीर संदेश देती है—जब सिस्टम कागज़ों पर जिंदा लोगों को मृत घोषित करने लगे, तो सवाल सिर्फ गलती का नहीं, बल्कि नीयत, प्रक्रिया और लोकतंत्र की सेहत का होता है। पश्चिम बंगाल का यह मामला अब एक व्यक्ति के अजीब विरोध से आगे बढ़कर मतदाता सूची, चुनावी पारदर्शिता और जनविश्वास के बड़े सवाल में बदल चुका है।




