हैदराबाद, 24 सितंबर 2025।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने केंद्र सरकार की नीतियों पर सीधा वार किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कुंभ मेला जैसे विशाल आयोजन के लिए करोड़ों रुपये का बजट दिया जाता है, तब देशभर में होने वाले क्षेत्रीय और पारंपरिक मेलों को क्यों नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। रेवंत रेड्डी ने कहा कि यह सिर्फ वित्तीय असंतुलन नहीं बल्कि संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ है। उन्होंने केंद्र पर आरोप लगाया कि वह केवल कुछ चुनिंदा आयोजनों को महत्व देकर देश की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय आस्थाओं को दरकिनार कर रही है।
“भारत की आत्मा को अनदेखा करना अनुचित”
रेवंत रेड्डी ने अपने बयान में कहा कि छोटे-छोटे मेले और धार्मिक पर्व ही भारत की असली पहचान हैं। उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार यह भूल रही है कि भारत की आत्मा उसकी विविधता और क्षेत्रीय परंपराओं में है। जब करोड़ों रुपये एक आयोजन को मिलते हैं, तो दूसरे प्रदेशों के उत्सवों और मेलों को क्यों दरकिनार किया जाता है?” उनका मानना है कि यह नीति न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि राज्यों के साथ भेदभाव का भी संकेत देती है।
गोदावरी पुष्करालु का उदाहरण
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने विशेष तौर पर गोदावरी पुष्करालु का जिक्र किया, जिसे दक्षिण भारत का “कुंभ मेला” कहा जाता है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन में लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं और इसका महत्व किसी भी राष्ट्रीय आयोजन से कम नहीं है। फिर भी, केंद्र सरकार की ओर से इसे वह सहयोग नहीं मिलता, जो उत्तर भारत के आयोजनों को दिया जाता है। रेवंत रेड्डी ने साफ किया कि उनकी सरकार इस बार गोदावरी पुष्करालु के लिए स्थायी ढांचा और आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराएगी, लेकिन इसके लिए केंद्र से भी विशेष पैकेज की मांग की जाएगी।
राज्यों के साथ भेदभाव का आरोप
रेवंत रेड्डी ने अपने बयान को और तीखा बनाते हुए कहा कि केंद्र सरकार की इस नीति से ऐसा लगता है मानो केवल कुछ विशेष राज्य ही प्राथमिकता में हों। उन्होंने कहा कि एक ओर “राष्ट्रीय आयोजन” कहकर कुंभ को करोड़ों की मदद दी जाती है, वहीं दूसरी ओर मेदारम जातरा, पुष्करालु और अन्य बड़े दक्षिणी पर्व अपने आप में संघर्ष करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि यह “विकास का असंतुलन” है और इससे देश के अलग-अलग हिस्सों में असंतोष पैदा होता है।
राजनीतिक निहितार्थ और विपक्ष का संदेश
रेवंत रेड्डी का यह हमला केवल सांस्कृतिक और धार्मिक मेलों तक सीमित नहीं है। यह बयान दरअसल केंद्र बनाम राज्यों की ताकत की लड़ाई को दिखाता है। कांग्रेस शासित तेलंगाना सरकार का यह आरोप भाजपा नीत केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की नई रणनीति भी माना जा रहा है। रेवंत का कहना है कि क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान किए बिना भारत की एकता को मजबूत नहीं किया जा सकता। उनका यह भी कहना था कि अब समय आ गया है कि केंद्र अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करे और सभी राज्यों को समान अवसर दे।
आगे क्या?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह विवाद आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। अगर केंद्र तेलंगाना जैसे राज्यों की मांगों पर ध्यान नहीं देता तो क्षेत्रीय असंतोष चुनावी मुद्दा बन सकता है। रेवंत रेड्डी ने संकेत दिया है कि वे इस मामले को राष्ट्रीय मंचों पर भी उठाएंगे। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इस आरोप का क्या जवाब देती है और क्या क्षेत्रीय मेलों को भविष्य में वैसा ही समर्थन मिलेगा जैसा कुंभ जैसे आयोजनों को मिलता है। यह बयान न केवल केंद्र की वित्तीय नीतियों को चुनौती देता है बल्कि भारतीय संघीय ढांचे में समानता और न्याय की बहस को भी नई दिशा देता है।




