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NDTV पर बयान तोड़ने-मरोड़ने का आरोप, कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने जताई कड़ी नाराज़गी

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कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने सोमवार को NDTV पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि चैनल ने उनके ANI को दिए गए बयान में से एक वाक्य अलग करके इस तरह प्रस्तुत किया, मानो वे आतंकवाद का समर्थन कर रहे हों या अल-फलाह मामले में आरोपितों का बचाव कर रहे हों। दीक्षित ने सोशल मीडिया पर विस्तृत प्रतिक्रिया जारी करते हुए कहा कि NDTV की यह प्रस्तुति न केवल भ्रामक है, बल्कि उनके पूरे बयान के संदर्भ को गलत दिशा में मोड़ने का प्रयास भी है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी भी तरह से आतंकवाद या संदिग्ध संस्थाओं का पक्ष लेना नहीं था, बल्कि उन्होंने स्पष्ट रूप से NIA से निष्पक्ष जांच की मांग की थी, ताकि सच सामने आ सके और किसी निर्दोष व्यक्ति को सज़ा न मिले। दीक्षित ने इसे मीडिया की गैर-जिम्मेदारी बताया और कहा कि ऐसे संपादित और भ्रामक प्रस्तुतिकरण से पत्रकारिता की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुँचती है।

“पूरा वीडियो चलाएं, बयान नहीं तोड़ें” – दीक्षित का NDTV को सीधा संदेश

संदीप दीक्षित ने NDTV से मांग की कि वह उनके बयान का पूरा वीडियो प्रसारित करे और दर्शकों के सामने समूचा संदर्भ रखे। उन्होंने कहा कि उनके बयान का सिर्फ एक हिस्सा दिखाकर यह संकेत देना कि वे अल-फलाह संगठन या आतंकवाद के आरोपों का बचाव कर रहे हैं, सरासर गलत है। उनके अनुसार उन्होंने अपने बयान में दो स्पष्ट बातें रखी थीं—पहली, कि मौलाना अरशद मदनी का यह सामान्य कथन कि मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है, समाज की बढ़ती भावना को दर्शाता है; और दूसरी, कि अल-फलाह जैसे विशेष मामलों को इस सामान्य बयान के साथ जोड़ना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने विशेष रूप से NIA से आग्रह किया कि वह अल-फलाह डॉक्टरों के मामले में निष्पक्ष और सटीक जांच करे तथा किसी निर्दोष को जेल में न डाला जाए। इस स्पष्ट स्थिति के बावजूद NDTV ने उनके बयान को गलत रूप से प्रोजेक्ट किया, जो उनकी नजर में जानबूझकर किया गया प्रयास लगता है।

“सरकार का एक व्यवस्थित अभियान चल रहा है” – दीक्षित ने दोहराया अपना रुख

अपने बयान में संदीप दीक्षित ने यह भी कहा कि वर्तमान सरकार एक व्यवस्थित तरीके से एक खास धर्म और उससे जुड़े पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी व पेशेवर वर्ग के लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी में एक भी मुस्लिम सांसद का न होना, तथा कई योग्य मुस्लिम नाम वाले व्यक्तियों का उपेक्षित महसूस करना, इस व्यापक सामाजिक माहौल का संकेत है। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि जिस प्रकार एक समय दलितों और अनुसूचित जातियों के साथ खुला भेदभाव किया जाता था, वैसी ही भावना अब समाज के एक हिस्से में मुसलमानों के प्रति विकसित होती दिखाई दे रही है। उनके अनुसार यह एक गंभीर सामाजिक संकेत है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

“अल-फलाह मामले को सामान्य मुद्दे से जोड़ना गलत”

दीक्षित ने दोहराया कि मौलाना मदनी का बयान एक व्यापक सामाजिक भावना पर आधारित है, लेकिन उसे अल-फलाह या किसी अन्य विशेष मामले से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। उन्होंने कहा कि अल-फलाह का मामला अलग परिस्थितियों में सामने आया है और इस पर फैसला भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस जांच और सबूतों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि यदि NIA अपनी जांच में किसी अनियमितता या गलत गतिविधि का प्रमाण पाती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन यदि कोई निर्दोष है तो उसे सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि भावनात्मक या राजनीतिक जोड़तोड़ के कारण किसी बेगुनाह को जेल भेज देना लोकतंत्र और न्याय प्रणाली दोनों के लिए खतरा है।

मीडिया की भूमिका पर सवाल, पत्रकारिता की जिम्मेदारी याद दिलाई

संदीप दीक्षित ने NDTV को संबोधित करते हुए कहा कि मीडिया का काम तथ्यों को संपूर्णता में प्रस्तुत करना है, न कि किसी बयान को काट-छांटकर सनसनी फैलाना। उन्होंने कहा कि मीडिया जब तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है, तो न केवल व्यक्ति की छवि खराब होती है, बल्कि समाज में गलतफहमी और ध्रुवीकरण बढ़ता है। उन्होंने NDTV से कहा कि वह पूरा वीडियो प्रसारित करे और दर्शकों को सही जानकारी दे, ताकि लोग स्वयं संदर्भ समझ सकें और निष्कर्ष निकाल सकें। दीक्षित का यह बयान मीडिया की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या आज पत्रकारिता सच दिखाने के बजाय राजनीतिक नैरेटिव बनाने के दबाव में काम कर रही है।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर मीडिया की जिम्मेदारी, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और बयान के संदर्भ को सही प्रस्तुत करने की गरिमा पर बहस छेड़ दी है। कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित का यह आरोप मीडिया विश्वसनीयता की उस दरार को उजागर करता है, जिसे भरना आज भारतीय पत्रकारिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

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