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Coldrif कांड : भारत की ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ पर गंभीर सवाल

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नई दिल्ली 9 अक्टूबर 2025

भारत को दुनिया की “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है — एक ऐसा देश जो सस्ती और असरदार दवाओं के ज़रिए अरबों लोगों की ज़िंदगियाँ बचाने का दावा करता है। लेकिन हर कुछ वर्षों में, एक ऐसा हादसा इस दावे की बुनियाद को हिला देता है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में उस दर्जे के लायक हैं। Coldrif कफ सिरप से जुड़ी बच्चों की मौतें और इस मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की भारत से औपचारिक स्पष्टीकरण की मांग, इस आत्मसंतुष्टि को झकझोर देने वाला एक बड़ा झटका है। यह सिर्फ एक सिरप की कहानी नहीं है — यह भारत के दवा नियमन, प्रशासनिक पारदर्शिता और कॉर्पोरेट नैतिकता की विफलता की एक दर्दनाक मिसाल है।

WHO का यह सवाल कि “क्या Coldrif सिरप भारत से निर्यात किया गया था?” दिखने में साधारण लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी चिंता छिपी है। यह सवाल भारत की फार्मा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सीधा वार है। एक तरफ भारत दुनिया के 150 से अधिक देशों को दवाएँ निर्यात करता है, और दूसरी ओर WHO को बार-बार यह पूछना पड़ता है कि क्या भारत की दवा उत्पादन प्रक्रिया सुरक्षित और पारदर्शी है। यह स्थिति न केवल हमारे औद्योगिक ढाँचे की कमजोरी को उजागर करती है, बल्कि हमारी नियामक संस्थाओं (Regulatory Authorities) की क्षमता पर भी गहरे सवाल खड़े करती है।

मध्य प्रदेश के चिंदवाड़ा जिले में 18 मासूम बच्चों की मौत का यह मामला यह दिखाता है कि भारत की निगरानी प्रणाली कितनी कमजोर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, Coldrif सिरप में डायएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) जैसे जहरीले रसायन पाए जाने की आशंका है — वही रसायन जो पहले गाम्बिया, उज्बेकिस्तान और कैमरून जैसे देशों में 100 से अधिक बच्चों की मौत का कारण बन चुका है। इन घटनाओं के बाद भारत सरकार ने घोषणा की थी कि अब से हर निर्यातित सिरप को सरकारी लैब में टेस्ट करवाना अनिवार्य होगा। सवाल यह है कि फिर Coldrif जैसी दवा बिना जांच कैसे बाजार तक पहुंची? क्या यह स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, लापरवाही या कॉर्पोरेट-सरकारी गठजोड़ का परिणाम था?

केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने अब जाकर जांच शुरू की है, कंपनी की इकाइयाँ बंद कर दी गई हैं और WHO को जवाब तैयार किया जा रहा है। लेकिन क्या ये कदम पर्याप्त हैं? इस देश में हर बार “जांच” एक औपचारिक रस्म बनकर रह जाती है। गाम्बिया और उज्बेकिस्तान की त्रासदियों के बाद भी जिन कंपनियों ने बच्चों की जान ली, उनके खिलाफ कोई कठोर आपराधिक कार्रवाई नहीं हुई। यही लापरवाही अब दोबारा दोहराई जा रही है। जब तक दवा उद्योग को जवाबदेही के दायरे में नहीं लाया जाएगा, और दोषी कंपनियों को सिर्फ लाइसेंस रद्द करने के बजाय जेल की सजा नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसे हादसे बार-बार होते रहेंगे।

भारत का फार्मा उद्योग 50 अरब डॉलर का है, और उसमें लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा निर्यात पर निर्भर है। इसका अर्थ है कि भारत केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी नहीं उठाता, बल्कि वह दुनिया के गरीब और विकासशील देशों के नागरिकों की जान का भी संरक्षक है। जब ऐसी कोई घटना घटती है, तो यह सिर्फ एक “उद्योगिक गलती” नहीं होती — यह राष्ट्रीय चरित्र पर धब्बा होती है। जो देश खुद को विश्वगुरु और मानवता का रक्षक कहता है, क्या उसे यह शोभा देता है कि उसकी बनी दवाओं से मासूम बच्चे मरें?

यह सवाल भी उठता है कि फार्मा कंपनियाँ इतनी लापरवाह क्यों हैं? जवाब सीधा है — क्योंकि उन्हें पता है कि उन पर किसी का डर नहीं है। जब दवा माफिया और राजनीतिक संरक्षण एक-दूसरे के साथी बन जाएँ, तब गुणवत्ता और मानवीयता दोनों कुचल दी जाती हैं। Coldrif कांड केवल एक उत्पाद की असफलता नहीं, बल्कि एक प्रणाली की सड़ांध है, जो वर्षों से चेतावनी के बावजूद सुधार नहीं चाहती। इस स्थिति में WHO का दखल आना लाजमी है, क्योंकि भारत का नियामक ढाँचा खुद आत्मनिर्भर नहीं रहा।

अब वक्त आ गया है कि भारत अपनी फार्मा नीति को “कागज़ी सुरक्षा मानकों” से निकालकर जवाबदेही आधारित ढाँचे में बदले। हर दवा बैच की डिजिटल ट्रैकिंग, हर कच्चे माल का पारदर्शी स्रोत, और हर निर्माता का सार्वजनिक ऑडिट रिकॉर्ड अनिवार्य होना चाहिए। यह न केवल उद्योग की विश्वसनीयता बढ़ाएगा, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी सुरक्षित करेगा। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि स्वास्थ्य मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय और विदेश मंत्रालय मिलकर दवा निर्यात की एक संयुक्त निगरानी प्रणाली बनाएं ताकि कोई भी संदिग्ध उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में न जा सके।

भारत ने दुनिया को जीवनरक्षक दवाएँ दी हैं — टीके, इंसुलिन, जेनेरिक दवाएँ — और करोड़ों लोगों की जान बचाई है। पर अब दुनिया सिर्फ “सस्ती दवाओं” से नहीं, सुरक्षित दवाओं की गारंटी चाहती है। Coldrif कांड हमें यह याद दिलाता है कि जिम्मेदारी के बिना उत्पादन, इंसानियत के खिलाफ अपराध है।

“फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” होना गर्व की बात है, लेकिन यह उपाधि तब तक सार्थक नहीं जब तक हर भारतीय दवा बच्चे की जान बचाने का भरोसा दे सके, न कि उसकी मौत का कारण बने। जब तक दवा कंपनियों को अपने कर्मों का जवाब देने की मजबूरी नहीं होगी, तब तक भारत का यह गौरवशाली दर्जा सिर्फ एक भ्रम रहेगा — और WHO के सवाल बार-बार लौटते रहेंगे।

 

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