हेग (नीदरलैंड्स)/ नई दिल्ली । 30 जुलाई 2025 —
पिछला सप्ताह विश्व पर्यावरण इतिहास में (23 जुलाई 2025 का दिन) एक मील का पत्थर बन गया, जब नीदरलैंड्स के हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice, ICJ) ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया कि जलवायु परिवर्तन से निपटना अब केवल एक नैतिक या राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कानूनी बाध्यता है। इस निर्णय के माध्यम से ICJ ने यह माना कि राज्यों की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करें, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कार्यों को रोके और वर्तमान तथा आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ, स्वच्छ और टिकाऊ वातावरण सुनिश्चित करें। यह पहली बार है जब दुनिया की सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय अदालत ने जलवायु संकट को मानवाधिकारों के दायरे में रखते हुए इसे न्यायिक परिप्रेक्ष्य से देखा है।
इस निर्णय की पृष्ठभूमि बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील है। छोटे द्वीपीय देशों जैसे वानुआतु, तुवालु, और अन्य जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित राष्ट्रों ने 2023 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के माध्यम से ICJ से यह आग्रह किया था कि वह जलवायु परिवर्तन को लेकर देशों की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों पर कानूनी व्याख्या दे। यह पहल उन देशों की ओर से की गई थी जो खुद ग्रीनहाउस गैसों के बड़े उत्सर्जक नहीं हैं, लेकिन समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, तीव्र चक्रवातों और प्राकृतिक आपदाओं के चलते अस्तित्व संकट का सामना कर रहे हैं। ICJ ने इन देशों की पीड़ा को मान्यता देते हुए यह कहा कि “जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरे अब पर्यावरणीय नहीं, बल्कि अस्तित्व के संकट बन चुके हैं”, और इसमें प्रत्येक देश की भूमिका को कानूनी रूप से जवाबदेह ठहराया जाना जरूरी है।
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि केवल राज्य सरकारें ही नहीं, बल्कि उन देशों की प्राइवेट कंपनियाँ, विशेषकर जीवाश्म ईंधन उद्योगों से जुड़ी इकाइयाँ भी इस जिम्मेदारी के दायरे में आती हैं। यदि कोई देश या उसके भीतर कार्यरत कंपनियाँ जानबूझकर या लापरवाही से जलवायु संकट को बढ़ावा देती हैं, तो उन्हें नुकसान की भरपाई (reparations) और पुनर्स्थापन (restoration) की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। यह विचार बेहद क्रांतिकारी है, क्योंकि अब जलवायु संकट से हुए पर्यावरणीय और मानवीय नुकसान को अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मंचों पर चुनौती दी जा सकेगी। निर्णय भले ही “सलाहकार राय” के तौर पर आया है, लेकिन इसका वैधानिक और नैतिक प्रभाव आने वाले वर्षों में नीति-निर्माण, मुकदमों और अंतरराष्ट्रीय संधियों पर स्पष्ट रूप से पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय वैश्विक जलवायु वार्ताओं के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। यह वैश्विक दक्षिण (Global South) के उन देशों के लिए उम्मीद की किरण बनकर आया है जो वर्षों से जलवायु न्याय की मांग कर रहे थे, लेकिन उन्हें केवल वादों और घोषणाओं से ही संतुष्ट रहना पड़ता था। अब वे इस निर्णय को आधार बनाकर न केवल संयुक्त राष्ट्र में बल्कि COP सम्मेलनों, जलवायु फंडिंग एजेंसियों और क्षेत्रीय न्यायालयों में भी अपने पक्ष को मज़बूती से रख सकेंगे। यह फैसला यह संकेत देता है कि अब जलवायु न्याय केवल कार्यकर्ताओं की नारा नहीं रहा, बल्कि यह संवैधानिक, नैतिक और न्यायिक हक बन गया है।
इस निर्णय का सीधा असर उन विकसित देशों पर भी पड़ेगा जो दशकों से बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन करते आ रहे हैं और जिन्होंने वैश्विक तापमान वृद्धि में प्रमुख भूमिका निभाई है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन और अन्य विकसित राष्ट्रों को अब अपने राष्ट्रीय कानूनों, कार्बन बजट, और औद्योगिक नीतियों को इस नई वैश्विक न्यायिक सोच के अनुरूप ढालना होगा। वहीं भारत जैसे देश, जो तेजी से विकास के पथ पर हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं — उनके लिए यह अवसर है कि वे अपनी जलवायु नीति को अधिक सशक्त बनाते हुए “जलवायु नेतृत्वकर्ता” के रूप में उभरें।
संक्षेप में कहें तो, पिछले सप्ताह, “हेग” से आया यह फैसला मानवता के पक्ष में पर्यावरणीय न्याय की जीत है। यह सिद्ध करता है कि पृथ्वी की रक्षा अब केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि कानूनी आदेश है। यह आने वाली पीढ़ियों के जीवन और उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए उठाया गया ऐसा कदम है, जो आने वाले दशकों तक जलवायु नीति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक जवाबदेही को आकार देगा। यदि इसे सही दिशा में अपनाया जाए, तो यह निर्णय वैश्विक जलवायु संघर्ष की दिशा और दशा — दोनों को बदलने में सक्षम है।




