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क्लीन टॉयलेट: सुविधा नहीं, बुनियादी अधिकार

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ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 मार्च 2026

दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा Jamia Millia Islamia को एक महिला प्रोफेसर के मामले में फटकार लगाना सिर्फ एक संस्थान की लापरवाही का मामला नहीं है, यह पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। अदालत की यह टिप्पणी कि “साफ टॉयलेट एक बेसिक जरूरत है” — अपने आप में एक सच्चाई है, जिसे हम वर्षों से नजरअंदाज करते आए हैं।

मुद्दा सिर्फ जामिया का नहीं, पूरे सिस्टम का है

देश के हजारों स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय आज भी बुनियादी सुविधाओं से जूझ रहे हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में स्थिति और भी चिंताजनक है। कई जगहों पर या तो टॉयलेट हैं ही नहीं, और जहां हैं, वहां उनकी हालत इतनी खराब है कि उनका इस्तेमाल करना स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाता है।

यह विडंबना ही है कि हम डिजिटल इंडिया, स्मार्ट क्लास और एआई आधारित शिक्षा की बात करते हैं, लेकिन बच्चों को साफ और सुरक्षित शौचालय तक नहीं दे पाते।

लड़कियों की शिक्षा पर सीधा असर

स्कूलों में टॉयलेट की कमी या गंदगी का सबसे बड़ा असर लड़कियों पर पड़ता है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश में बड़ी संख्या में लड़कियां सिर्फ इसलिए स्कूल छोड़ देती हैं क्योंकि वहां उनके लिए सुरक्षित और साफ शौचालय नहीं होते।

मासिक धर्म के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाती है। स्वच्छता और गोपनीयता की कमी, लड़कियों को शिक्षा से दूर धकेल देती है — और यही से शुरू होती है एक असमान भविष्य की कहानी।

केंद्रीय संस्थान भी अछूते नहीं

यह सोच लेना कि केवल ग्रामीण या सरकारी स्कूल ही इस समस्या से जूझ रहे हैं, एक भ्रम है। कई केंद्रीय विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी टॉयलेट की स्थिति बेहद खराब है। बदबू, गंदगी और रखरखाव की कमी — यह सब उस सिस्टम की पोल खोलते हैं जो खुद को “विश्वस्तरीय” बताने में लगा रहता है।

गंदे और बदबूदार टॉयलेट किसी भी शैक्षणिक संस्थान के लिए सिर्फ एक कमी नहीं, बल्कि एक कलंक हैं।

सम्मान और स्वास्थ्य से जुड़ा सवाल

साफ टॉयलेट सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि सम्मान और स्वास्थ्य का सवाल है। एक छात्र, एक शिक्षिका या एक कर्मचारी — सभी को यह अधिकार है कि वे स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण में अपनी दिनचर्या पूरी कर सकें।

जब एक महिला प्रोफेसर को सिर्फ इस बात के लिए माफी मांगने को कहा जाता है कि उन्होंने “यूजेबल वॉशरूम” की मांग की, तो यह केवल प्रशासनिक असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि मानसिकता की समस्या भी है।

अब भी वक्त है जागने का

सरकारें योजनाएं बनाती हैं, बजट जारी होता है, लेकिन जमीन पर उसका असर अक्सर नजर नहीं आता। अब समय आ गया है कि “स्वच्छता” को केवल नारे तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे सख्ती से लागू किया जाए।

हर स्कूल और कॉलेज में नियमित निरीक्षण अनिवार्य हो

टॉयलेट की सफाई के लिए जवाबदेही तय हो

लड़कियों के लिए अलग और सुरक्षित सुविधाएं सुनिश्चित हों

छात्रों और स्टाफ की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए

दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार एक चेतावनी है — केवल Jamia Millia Islamia के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए। अगर हम अपने बच्चों और शिक्षकों को बुनियादी सुविधाएं नहीं दे सकते, तो “विश्वगुरु” बनने के दावे खोखले ही रहेंगे। क्योंकि शिक्षा की असली शुरुआत किताबों से नहीं, बल्कि एक सम्मानजनक और स्वच्छ वातावरण से होती है।

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