आलोक कुमार | नई दिल्ली 24 नवंबर 2025
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी आर गवई ने रिटायर होने के तुरंत बाद ऐसा कदम उठाया, जिसकी न्यायिक दुनिया में बहुत कम मिसाल मिलती है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से जस्टिस बी वी नागरत्ना के उस असहमति भरे नोट पर सवाल उठाए, जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की एक सिफारिश के खिलाफ दिया था। खास बात यह है कि जस्टिस नागरत्ना आने वाले समय में देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने वाली हैं। इसलिए यह टिप्पणी और भी ज़्यादा चर्चा में आ गई है।
गवई ने कहा कि कोलेजियम में असहमति कोई नई या बड़ी बात नहीं है। लेकिन इसके बाद उन्होंने एक ऐसा बयान दिया जिसने मामले का माहौल बदल दिया। उन्होंने कहा—“अगर उस असहमति में कोई दम होता, तो बाकी चार जज भी उससे सहमत होते।” यानी उन्होंने साफ संकेत दिया कि नागरत्ना की आपत्ति मजबूत नहीं थी, तभी बाकी सदस्य उससे नहीं जुड़े। यह बयान सिर्फ सामान्य टिप्पणी नहीं माना जा रहा, बल्कि कोलेजियम के बहुमत वाले फैसले का खुलकर बचाव करते हुए देखा जा रहा है।
आमतौर पर किसी मुख्य न्यायाधीश की विदाई के मौके पर प्रेस से बातचीत बहुत औपचारिक होती है। वे किसी विवाद या अंदरूनी मुद्दों पर बोलने से बचते हैं। लेकिन इस बार माहौल बिल्कुल उल्टा दिखा। गवई ने स्पष्ट और तीखे अंदाज़ में अपनी बात रखी, जिससे यह संदेश गया कि कोलेजियम बहुमत के फैसले को सबसे ज़्यादा महत्व देता है और असहमति को सिर्फ एक राय की तरह देखता है, न कि किसी रुकावट के तौर पर।
यह मामला पहले से ही संवेदनशील माना जा रहा था, क्योंकि जिस न्यायिक नियुक्ति की सिफारिश की गई थी, उस पर राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर चर्चा चल रही थी। इसके बावजूद कोलेजियम ने नागरत्ना की लिखित आपत्ति को दरकिनार करते हुए सिफारिश आगे बढ़ा दी। इससे यह समझ आता है कि कोलेजियम के अंदर भी बहुमत की राय ही फैसलों को आगे ले जाती है, चाहे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण जज असहमत क्यों न हों।
इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायिक नियुक्ति प्रणाली को समझने वालों के लिए एक बड़ा संकेत दिया है। इससे पता चलता है कि गवई के समय का कोलेजियम अपने निर्णय को बहुमत की सहमति के आधार पर सही मानता है, और किसी एक असहमति को निर्णायक नहीं मानता। हालांकि अभी तक यह पता नहीं चला है कि जस्टिस नागरत्ना ने किस आधार पर आपत्ति दर्ज की थी—वह नैतिक थी, प्रक्रियागत थी या मामले से जुड़ी कोई अन्य चिंता थी—क्योंकि इन कारणों को सार्वजनिक नहीं किया गया।
फिर भी, गवई का यह सार्वजनिक बयान इस विवाद पर एक तरह से अंतिम टिप्पणी जैसा महसूस होता है। उन्होंने साफ कर दिया कि असहमति होने के बावजूद कोलेजियम अपने फैसले आगे बढ़ाता रहेगा। अब नया कोलेजियम इसी पृष्ठभूमि में काम शुरू करेगा, जहां यह मतभेद मौजूद रहेगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नया नेतृत्व इस मुद्दे को कैसे संभालता है और क्या असहमति की भूमिका आगे बढ़ेगी या बहुमत का फैसला ही हमेशा हावी रहेगा।




