नई दिल्ली 4 नवंबर 2025
भारत के प्रधान न्यायाधीश (Chief Justice of India) बी.आर. गवई सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के रवैये पर खुलकर नाराज़ होते नज़र आए। मामला अधिकरण सुधार (सुव्यवस्थीकरण एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 2021 चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा है, जिनकी अंतिम सुनवाई तक पहुँच चुका था। परंतु इसी बीच केंद्र सरकार की तरफ से अचानक आग्रह किया गया कि इस मामले को पाँच जजों की संविधान पीठ को भेजा जाए। इस अप्रत्याशित मांग पर CJI गवई ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार मौजूदा पीठ से बचने की कोशिश कर रही है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि एक पक्ष की पूरी दलील सुन लेने और अटॉर्नी जनरल को अंतिम जवाब देने की मोहलत देने के बाद इस तरह की अर्जी न्यायसम्मत नहीं मानी जा सकती।
CJI गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि केंद्र को याचिका के शुरुआती चरण में ही यह मुद्दा उठाना चाहिए था। अदालत का कहना है कि यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि सरकार ने प्रारंभिक दौर में कोई आपत्ति नहीं जताई, बल्कि पिछली तारीख़ पर अटॉर्नी जनरल ने केवल निजी कारणों के चलते सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया था। अब जब अदालत फैसले के बहुत नज़दीक है, ऐसे समय में प्रक्रिया बदलने की कोशिश को अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया के साथ हस्तक्षेप माना है। CJI ने कहा —
“अगर हम इस अर्जी को ख़ारिज करते हैं तो यह रिकॉर्ड में रह जाएगा कि सरकार इस पीठ से बचना चाहती थी।”
अदालत की नाराज़गी के साथ-साथ इस बयान का समय भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि CJI गवई 23 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। सामान्यत: रिटायरमेंट से पहले CJI महत्वपूर्ण मामलों के नतीजे अंतिम रूप में लाते हैं। ऐसे में केंद्र का यह कदम अदालत को इसलिए भी आपत्तिजनक लगा क्योंकि इससे केस को लंबा खींचने और निर्णय टालने की कोशिश का संकेत मिलता है। कोर्ट ने कहा कि यदि बहस के दौरान आवश्यकता महसूस हुई तो वह स्वयं मामले को बड़ी पीठ को भेजने पर विचार करेगा, लेकिन सरकार की आधी रात को आई अर्जी पर ऐसा नहीं किया जाएगा।
विवादित 2021 का अधिकरण सुधार अधिनियम न केवल कई अपीलीय अधिकरणों को समाप्त करता है बल्कि विभिन्न अधिकरणों में नियुक्ति और सेवा शर्तों में ऐसे बदलाव करता है, जिससे कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ने और न्यायिक स्वतंत्रता कमज़ोर होने का जोखिम बताया गया है। मद्रास बार एसोसिएशन समेत अनेक याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि यह कानून संविधान की मूल भावना पर चोट करता है। वहीं केंद्र का कहना है कि अधिनियम को लागू होने और अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए समय दिया जाना चाहिए, इसलिए मामले को बड़ी पीठ को भेजा जाए।
इस कानूनी खींचतान के बीच अदालत ने अटॉर्नी जनरल को स्पष्ट तौर पर निर्देश दिया कि वह सीमित दायरे में ही बहस करें और याचिकाकर्ता की दलीलों का जवाब प्रस्तुत करें। अदालत ने कहा कि वह किसी भी दबाव या रणनीतिक कदम के आधार पर मामले की सुनवाई की दिशा तय नहीं करेगी। न्यायमूर्ति चंद्रन ने भी टिप्पणी की कि इस स्तर पर देरी की रणनीति अदालत स्वीकार नहीं करेगी, क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान और समय का मूल्य सर्वोपरि है।
यह मामला केवल एक कानून की वैधता का मुद्दा ही नहीं है, बल्कि न्यायपालिका-कार्यपालिका के संबंध और स्वतंत्र न्याय व्यवस्था के भविष्य पर भी बहुत बड़ा संकेतक है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त प्रतिक्रिया बताती है कि न्यायपालिका किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव या प्रक्रिया में हस्तक्षेप को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। अब शुक्रवार को होने वाली अगली सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं — यह तय करेगी कि अदालत अंतिम दलीलें पूरी कर अपना निर्णय सुरक्षित करेगी या फिर आगे कोई और संवैधानिक प्रक्रिया अपनाएगी।




