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क्राइस्ट यूनिवर्सिटी ने ग्रामीण समुदायों के लिए इंडोर पॉल्यूशन और सस्टेनेबल समाधानों पर चर्चा आयोजित की

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लेखक: 

– सान्वी ग्रोवर, बीए मीडिया साइकोलॉजी  

– अलीशा, बीए मीडिया और पब्लिक अफेयर्स, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज

क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, दिल्ली एनसीआर

दिल्ली एनसीआर, 16 अगस्त 2025

क्राइस्ट (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी), दिल्ली एनसीआर कैंपस के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज ने IndianMasterminds.com के सहयोग से एक बहुत ही महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक प्लेनरी डिस्कशन का आयोजन किया। इस चर्चा का विषय था “इंडोर पॉल्यूशन और ग्रामीण समुदायों के लिए सस्टेनेबल समाधान”। यह कार्यक्रम कैंपस के ब्लॉक-बी में स्थित मिनी ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ, जिसमें कई गणमान्य व्यक्तियों और विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इस आयोजन का उद्देश्य ग्रामीण भारत में इंडोर वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या और इसके समाधान के लिए टिकाऊ और प्रभावी उपायों पर प्रकाश डालना था।

 

इस कार्यक्रम में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज की डीन डॉ. जीन पॉलोस, विभागाध्यक्ष डॉ. शिवानी चौधरी, एकेडमिक कोऑर्डिनेटर डॉ. जितेंद्र भंडारी, और प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर डॉ. सलिनीता चौधरी उपस्थित थे। इनके अलावा, इस आयोजन में तीन प्रमुख अतिथि वक्ताओं ने अपनी विशेषज्ञता और अनुभव साझा किए। ये वक्ता थे: श्री रोहित मेहरा, जो एक IRS अधिकारी हैं और पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने कार्यों के कारण ‘ग्रीन मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से प्रसिद्ध हैं; सुश्री अनुमिता रॉयचौधरी, जो सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में रिसर्च और एडवोकेसी की कार्यकारी निदेशक हैं; और श्री शरद गुप्ता, जो IndianMasterminds.com के संपादक हैं। इन सभी ने इंडोर पॉल्यूशन की गंभीरता, इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों, और ग्रामीण क्षेत्रों में इसे कम करने के लिए जरूरी कदमों पर विस्तार से चर्चा की।

चर्चा में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर दिया गया। सबसे पहले, इंडोर वायु प्रदूषण के कारणों पर बात हुई, जैसे कि ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक चूल्हों का उपयोग, जो लकड़ी, कोयला या अन्य जैव ईंधन पर निर्भर होते हैं। इनसे निकलने वाला धुआं घर के अंदर हानिकारक प्रदूषण का कारण बनता है, जो विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। वक्ताओं ने इस समस्या से निपटने के लिए कई नवीन और टिकाऊ समाधानों का सुझाव दिया। इनमें स्वच्छ खाना पकाने के तरीकों को बढ़ावा देना, जैसे कि एलपीजी या बायोगैस स्टोव का उपयोग, शामिल था। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाने की जरूरत पर भी बल दिया गया। यह न केवल इंडोर पॉल्यूशन को कम करेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देगा।

इसके साथ ही, समुदाय-आधारित जागरूकता कार्यक्रमों की भूमिका पर भी विशेष ध्यान दिया गया। वक्ताओं ने बताया कि ग्रामीण समुदायों को शिक्षित करना और उन्हें स्वच्छ ऊर्जा के लाभों के बारे में जागरूक करना बहुत जरूरी है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं, जिसमें ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को शामिल किया जाए। नीति निर्माण में सहयोग और जमीनी स्तर पर पहल को भी महत्वपूर्ण बताया गया। वक्ताओं ने यह भी कहा कि सरकार, गैर-सरकारी संगठनों, और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो ग्रामीण समुदायों के लिए लंबे समय तक पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हों।

कार्यक्रम का समापन एक जीवंत और विचारोत्तेजक सवाल-जवाब सत्र के साथ हुआ। इस सत्र में छात्रों, शिक्षकों, और अतिथियों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया और इंडोर पॉल्यूशन से निपटने के लिए व्यावहारिक और प्रभावी समाधानों पर अपने विचार साझा किए। इस चर्चा ने न केवल इंडोर पॉल्यूशन की गंभीरता को उजागर किया, बल्कि यह भी दिखाया कि छोटे-छोटे कदम और सामूहिक प्रयास इस समस्या को हल करने में कितने कारगर हो सकते हैं।

यह आयोजन क्राइस्ट यूनिवर्सिटी की सस्टेनेबिलिटी, पर्यावरण जागरूकता, और समुदाय-केंद्रित शोध के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस तरह के आयोजनों के माध्यम से यूनिवर्सिटी न केवल अपने छात्रों को सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति जागरूक कर रही है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए भी योगदान दे रही है। यह चर्चा ग्रामीण भारत में स्वच्छ और स्वस्थ भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई।

 

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