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PM CARES Fund: राहत नहीं, रहस्य — सत्ता, पैसा और जवाबदेही से भागने की पूरी कहानी — चाल, चरित्र और चेहरा

एबीसी डेस्क | 31 दिसंबर 2025 महामारी में भरोसा मांगा गया, लेकिन ज़मीन पर जनता अकेली छोड़ दी गई कारवां मैगज़ीन की स्पेशल रिपोर्ट पीएम केयर्स फंड को लेकर सत्ता की उस सबसे बड़ी नैतिक विफलता को बेनकाब करती है, जिसे सरकार आज तक ढकने की कोशिश कर रही है। कोरोना महामारी के दौरान जब

प्रदूषण बना मुनाफ़े का मॉडल
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प्रदूषण बना मुनाफ़े का मॉडल: कार बाज़ार गुलज़ार, ऑटो और स्पेयर उद्योग मालामाल

प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली 29 दिसंबर 2025 हर सर्दी एक ही सवाल, हर साल वही जवाब दिल्ली में सर्दी आते ही हवा भारी हो जाती है। धूप धुंध में बदल जाती है, आंखों में जलन, गले में खराश और सांस में घुटन आम हो जाती है। स्कूलों के बाहर मास्क लगाए बच्चे

कांग्रेस के घर में बीजेपी की पंचायत
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ओपिनियन | कांग्रेस के घर में बीजेपी की पंचायत, संसद में बहस से भगदड़

एबीसी डेस्क 28 दिसंबर 2025 कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की X पोस्ट को लेकर मचा सियासी शोर दरअसल उस बेचैनी का नतीजा है, जो राहुल गांधी के लोकसभा में नेता विपक्ष बनने के बाद बीजेपी के भीतर साफ दिखाई देने लगी है। सवाल यह नहीं है कि दिग्विजय सिंह ने क्या कहा, असली

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ओपिनियन | कांग्रेस, दिग्विजय, थरूर और अनुशासन की असल कहानी

एबीसी डेस्क 27 दिसंबर 2025 दिग्विजय सिंह: भोले नहीं, बल्कि राजनीति के पुराने खिलाड़ी दिग्विजय सिंह को अक्सर ऐसा नेता दिखाया जाता है जो सहज, बेबाक और कभी-कभी जरूरत से ज़्यादा ईमानदार नजर आता है। लेकिन भारतीय राजनीति को समझने वाला हर आदमी जानता है कि दिग्विजय सिंह उतने भोले नहीं हैं जितने वे दिखाई

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ओपिनियन | छाया से सत्ता तक: कैसे ‘हिंदू-फर्स्ट’ राजनीति देश के संविधान और सामाजिक ताने-बाने को खोखला कर रही है

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट पर एबीसी डेस्क विश्लेषण नई दिल्ली | 27 दिसंबर 2025 सत्ता परिवर्तन नहीं, वैचारिक कब्ज़े की कहानी भारत में बीते कुछ वर्षों में जो राजनीतिक बदलाव आए हैं, वे केवल सरकार बदलने या चुनाव जीतने-हारने की कहानी नहीं हैं। यह एक धीमी लेकिन गहरी वैचारिक घुसपैठ की दास्तान है, जिसने देश

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ओपिनियन | नोटबंदी से मनरेगा तक: मनमानी फैसले और उनका बोझ उठाता देश

एबीसी डेस्क | 27 नवंबर 2025 पिछले कुछ सालों में देश ने बार-बार एक ही सच्चाई महसूस की है—बड़े फैसले अचानक आते हैं, बिना तैयारी, बिना संवाद और बिना यह सोचे कि उनका असर आम आदमी की ज़िंदगी पर क्या पड़ेगा। फैसले सत्ता के ऊपरी कमरों में लिए जाते हैं, लेकिन उनकी कीमत चुकाता है

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ओपिनियन | अब शेख़ी बघारने का क्या मतलब? जब भगोड़ों को भागने का मौका खुद ही दिया हो तो…

आलोक कुमार | नई दिल्ली 26 दिसंबर 2025 विदेश मंत्रालय का यह बयान कि “ऐसे भगोड़ों को कानून से नहीं बचने देंगे” सुनने में जितना सख़्त और राष्ट्रवादी लगता है, उतना ही यह आम आदमी के ज़हन में एक पुराना, चुभता हुआ सवाल भी जगा देता है। सवाल यह नहीं है कि सरकार आज क्या

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अटल का कठिन फैसला: जब टूटने के कगार पर थी बीजेपी, नई राह सोच रहे थे वाजपेयी

एबीसी डेस्क 25 दिसंबर 2025 अटल बिहारी वाजपेयी — नाम सुनते ही गर्व, गरिमा और लोकतांत्रिक राजनीति की एक अलग मिसाल दिमाग़ में उभरती है। लेकिन क्या आपको पता है कि एक समय ऐसा भी आया था जब वाजपेयी जी खुद अपनी नई पार्टी बनाने का विचार करने लगे थे? यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि

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मोदी काल में भारतीय पत्रकारिता: शोर से सत्ता तक, और नैतिकता के पतन की कहानी

मोदी काल में भारतीय पत्रकारिता का जो चेहरा उभरा है, वह केवल ऊँची आवाज़, तेज़ संगीत और सनसनीखेज़ ब्रेकिंग न्यूज़ का प्रतीक नहीं है, बल्कि एक गहरी नैतिक गिरावट का भी संकेत है। यह वह दौर है जब मीडिया के बड़े हिस्से ने अपनी बुनियादी जिम्मेदारी—जनता की आवाज़ बनना, सत्ता से सवाल पूछना और सच्चाई

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ओपिनियन | सुनिए दत्तात्रेय—भारत धर्मनिरपेक्ष है: न कोई धर्म बड़ा, न कोई छोटा; संविधान ही देश की आत्मा

अवधेश कुमार | 24 दिसंबर 2025 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबाले द्वारा हिंदू धर्म को श्रेष्ठ बताते हुए मुसलमानों से सूर्य नमस्कार करने तथा नदियों और प्रकृति की पूजा करने संबंधी टिप्पणी ने देश में एक बार फिर धर्म, आस्था और सह-अस्तित्व पर गहरी और संवेदनशील बहस छेड़ दी है। यह