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मनरेगा पर बुलडोज़र, लोकतंत्र पर चोट: सोनिया गांधी

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एबीसी डेस्क | 22 दिसंबर 2025

देश की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना मनरेगा को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने द हिन्दू अख़बार में लिखे अपने संपादकीय लेख में मोदी सरकार पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि मनरेगा को बिना जनसंवाद, बिना संसद में ठोस चर्चा और बिना राज्यों की सहमति के कमजोर किया गया है, जो सीधे-सीधे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर हमला है।

सोनिया गांधी लिखती हैं कि मनरेगा कोई साधारण योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के करोड़ों गरीब और मेहनतकश लोगों की रोज़ी-रोटी की गारंटी है। यह कानून लंबे विचार-विमर्श, संसद की सहमति और संविधान में निहित ‘काम के अधिकार’ की भावना से जन्मा था। लेकिन मौजूदा सरकार ने इसे धीरे-धीरे खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं — कभी बजट में कटौती करके, कभी राज्यों पर बोझ डालकर और कभी इसकी मूल आत्मा, यानी मांग आधारित रोजगार गारंटी को कमजोर करके।

उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने केंद्र-राज्य साझेदारी की भावना को भी चोट पहुंचाई है। पहले जहां मनरेगा का खर्च केंद्र ज्यादा वहन करता था, अब राज्यों पर अधिक जिम्मेदारी डाल दी गई है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों के लिए गरीबों को काम देना और भी मुश्किल हो गया है। इसका सीधा असर गांवों में रहने वाले उस आदमी पर पड़ेगा, जिसके लिए मनरेगा आख़िरी सहारा है।

सोनिया गांधी ने यह भी याद दिलाया कि कोविड महामारी जैसे कठिन समय में मनरेगा ने करोड़ों परिवारों को भूख और बेबसी से बचाया था। जब पूरा देश ठहर सा गया था, तब यही योजना गांवों में जीवनरेखा बनी। ऐसे में इस योजना को कमजोर करना न सिर्फ आर्थिक गलती है, बल्कि सामाजिक और नैतिक विफलता भी है।

अपने लेख में उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि इसे ‘विकास’ कहना सच्चाई से मुंह मोड़ना है। यह विकास नहीं, बल्कि विनाश है — जिसकी कीमत देश का मेहनतकश आदमी अपनी नौकरी, अपनी मजदूरी और अपने सम्मान से चुकाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि मनरेगा का खत्म होना सिर्फ एक योजना का अंत नहीं होगा, बल्कि इससे लोकतंत्र की जड़ें भी कमजोर होंगी।

कांग्रेस ने इस लेख के ज़रिये सरकार से अपील की है कि वह मनरेगा और संवैधानिक मूल्यों पर किए जा रहे इस हमले को रोके। सोनिया गांधी का यह संपादकीय सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उन करोड़ों आवाज़ों की गूंज है, जिनकी रोज़ी-रोटी आज खतरे में है।

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