फरवरी की उस सुबह जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में संघीय बजट 2025–26 पेश किया, तब यह स्पष्ट था कि यह मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की पहली व्यापक वित्तीय दस्तावेज़ होगी। इसका ध्येय स्पष्ट था: ऊँची जीडीपी वृद्धि की आकांक्षा के बीच मध्यम वर्ग, किसानों, महिलाओं और नवप्रवर्तकों को सहारा देना। इसका नारा था — “सबका आर्थिक उत्थान, सभी वर्गों को साथ लेकर आगे बढ़ना।”
बजट की कड़ी में चार प्राथमिक लक्ष्य परिलक्षित हुए:
- मध्यम वर्ग को कर भार से राहत देकर उसकी खर्च क्षमता और बचत क्षमता बढ़ाना
- कृषि, ग्रामीण रोजगार व खाद्य उत्पादन को प्रोत्साहित करना
- नवाचार, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं डिजिटल समावेशन को सुदृढ़ बनाना
- इन्फ्रास्ट्रक्चर, रक्षा और निवेश में संतुलित और स्थिर वृद्धि सुनिश्चित करना
जट की सबसे जोरदार घोषणा थी—₹12.75 लाख तक की आय पर आयकर मुक्त होना। इससे मध्यम वर्ग के लगभग 2.5–3 करोड़ करदाताओं को वार्षिक ₹1 लाख के करीब राहत मिलने का अनुमान था । सरकार का तर्क था कि इससे लोगों के हाथों में अधिक पैसा आएगा, जिससे वे वाहन, घर, फर्नीचर और तकनीकी उत्पाद जैसे खर्चों पर स्वेच्छा से निवेश कर सकते हैं। ऑटो और FMCG कंपनियों की ओर से इसका स्वागत हुआ, और वाहन निर्माताओं तथा FMCG कंपनियों के शेयरों में 4–8% की तेजी भी देखी गई ।
इसके अलावा, ₹12–24 लाख वार्षिक आय वाले लोगों के टैक्स स्लैब में भी भारी कटौती, और वरिष्ठ नागरिकों के लिए ब्याज आय पर ₹1 लाख तथा किराए पर ₹6 लाख तक TDS में छूट दी गई। भारत का HDFC बैंक आर्थिक विशेषज्ञों की मानें, तो यह कर सुधार केवल “तुरंत राहत” देने के बजाय दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा की दिशा में एक कदम है ।
हालांकि, आलोचक इसे “शुगर रश बजट” कहकर चुनौती दे रहे थे, क्योंकि उन्होंने कहा कि इससे दीर्घकालिक बदलाव—जैसे भूमि सुधार, श्रम सुधार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा—में कमी हुई । मूडीज़ के Christian de Guzman ने स्पष्ट किया कि राजस्व नुकसान के बीच पूंजीगत व्यय ठहरा हुआ था, जिससे बजट की दीर्घकालिक क्षमता पर सवाल उठता है ।
कृषि व ग्रामीण भारत — उत्पादकता व आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन
बजट ने कृषि क्षेत्र के लिए ~₹1.75 लाख करोड़ का पक्षपात जारी रखा, जिसे 15% वृद्धि मिली । प्रधानमंत्री किसान योजना, फसल ऋण सीमा ₹3 लाख से ₹5 लाख तक बढ़ाना, और दलहन उत्पादन मिशन के प्रति ध्यान—यह स्पष्ट संकेत था कि भारत ग्रामीण आत्मनिर्भरता को वित्तीय दृष्टि से मजबूत करना चाहता है।
कृषि कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाले उपाय भी शामिल थे। मोडी सरकार ने Pulses और Cotton पर लक्षित मिशन लॉन्च किए और खेती की लागत घटाने हेतु इनपुट टेक्स कंट्रोल (जैसे खाद, बीज) को प्राथमिकता दी । Adani Wilmar के CEO Angshu Mallick ने कहा कि यह बजट कृषि इकोसिस्टम को प्रतिस्पर्धी बनाएगा और खाद्य उत्पादों की घरेलू मांग को बढ़ाएगा ।
स्वास्थ्य और आयुष्मान भारत — सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल की दिशा में एक कदम
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी बजट ने मजबूती दिखाई। PM-JAY को लगभग 10% अधिक फंडिंग दी गई और कैंसर डे-केयर सेंटर को प्रत्येक जिले में स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया । राष्ट्रपति अस्पताल, Apollo Health जैसी संस्थाओं द्वारा इस पहल की प्रशंसा हुई, क्योंकि इससे स्वास्थ्य-सुविधा की पहुँच ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचेगी ।
डिजिटल हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए दूरसंचार बैंडविड्थ विस्तार और e-स्वास्थ्य परियोजनाओं की घोषणा की गई—जिनसे कोरोना महामारी के बाद पहले से स्थापित टेली-मेडिसिन प्रयास को और गहराई मिलेगी।
शिक्षा और नवाचार — मेडिकल क्षमता और डीप-टेक को बढ़ावा
शिक्षा क्षेत्र में मेडिकल सीटों की कमी को देखते हुए बजट में 10,000 नई मेडिकल सीटों की घोषणा की गई, और अगले पांच वर्षों में 75,000 और सीटों की योजना बनाई गई । इससे स्वास्थ्य कर्मियों की कमी ख़त्म करने और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी।
नवाचार क्षेत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ₹10,000 करोड़ के स्टार्टअप ऑफ फंड्स की घोषणा की गई एवं AI तथा Deep Tech के लिए केंद्रों की स्थापना की घोषणा की गई । अद्वेंचर्स Catalyst के सह-संस्थापक ने इसे “monumental step towards strengthening India’s startup ecosystem” कहा ।
इन्फ्रास्ट्रक्चर, रक्षा और पूंजीगत व्यय — संतुलन बनाम दिखावटी निवेश
पूंजीगत व्यय लगभग ₹11.2 लाख करोड़ (GDP का लगभग 4.4%) था, जो पिछले वर्ष के बराबर था लेकिन महीन रूप से कम वृद्धि दर्शाता है । नीति सुधारकारों ने इसे धीमा बताते हुए कहा कि भारत को पिछले वर्षों की तरह व्यापक पूंजीगत खर्च करने की आवश्यकता थी — खासकर जब रोजगार-आधारित विकास की बात हो ।
रक्षा क्षेत्र को कुल बजट का लगभग 13% (₹6.8 लाख करोड़) दिया गया, ताकि सीमा सुरक्षा व रक्षा उत्पादन को मजबूती दी जा सके ।
MSME, स्टार्टअप और गिग-इकोनॉमी वर्ग — नवाचार की ओर शिफ्ट
MSME सेक्टर को निवेश और टर्नओवर मानदंड में राहत दी गई, और Deep Tech पर विशेष ध्यान दिया गया। ₹10,000 करोड़ के स्टार्टअप फंड ऑफ फंड्स द्वारा उभरती टेक कंपनियों को अवसर मिलेंगे।
गिग-इकोनॉमी से जुड़े e-Shram रजिस्ट्रेशन एवं पहचान दस्तावेजों की व्यवस्था ने असंगठित श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली से जोड़ने की दिशा में काम किया।
आवास, ऊर्जा और राज्य ऋण — ग्रामीण व शहरी सुविधाएँ
राज्यों को बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए ₹1 लाख करोड़ ब्याज-मुक्त ऋण प्रदान किया गया । ग्रामीण आवास और सौर ऊर्जा—विशेषकर रूफटॉप सोलर—पर भी निवेश जारी रखा गया, जिससे ऊर्जा स्वतंत्रता को बढ़ावा मिला।
सकारात्मक पक्ष:
मध्यम वर्ग को कर राहत, जिससे मांग को बढ़ावा मिलेगा।
स्वास्थ्य, शिक्षा और नवाचार में निवेश से दीर्घकालिक मानव पूंजी सशक्त हुई।
एग्री मिशन और सरकारी समर्थन से खेती व ग्रामीण आर्थिक तंत्र मजबूत हुआ।
आलोचना:
पूंजीगत व्यय अपेक्षाकृत स्थिर रहा—विशेषकर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए; मुद्रित नमूना 30% वार्षिक वृद्धि अपेक्षित थी, पर बजट में केवल सामान्य वृद्धि रही।
आलोचना यह भी कि रोजगार-उत्पादक क्षेत्रों (जैसे निर्माण) पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
ज़मीन, श्रम, शिक्षा सुधार को छोड़ना चिंताजनक था—जो भारत को 8%+ वृद्धि के मार्गदर्शक केनीय थे ।
संघीय बजट 2025–26 ने स्पष्ट संदेश दिया—मध्यम वर्ग, किसान, स्वास्थ्य और तकनीक में लोगों का सशक्तिकरण। इस बजट ने आर्थिक उछाल के लिए कर-राहत, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा विस्तार और स्टार्टअप फंडिंग जैसी नीतियों को प्रस्तुत किया। साथ ही, यह संकेत भी दिया कि भारत खर्च और विकास दोनों में संतुलन बनाकर चलना चाहता है।
हालांकि, आलोचक इसे “संदेशात्मक + तात्कालिक हिसाब” वाला बजट बताते हुए कहते हैं कि दीर्घकालिक सुधारों व पूंजीगत व्यय की कमी से वृद्धि धीमी रह सकती है। आगे का परीक्षण इस बात पर निर्भर करेगा कि ये योजनाएँ वास्तविक अर्थों में क्रियान्वित होती हैं या सिर्फ कागज़ में सीमित रहती हैं, और क्या इससे नौकरियों की वृद्धि, वैश्विक प्रतिस्पर्धा व आर्थिक संरचना में असली बदलाव आता है।




