राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | चंडीगढ़/नई दिल्ली | 17 मार्च 2026
हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी अब अंदरखाने की फुसफुसाहट नहीं, बल्कि खुला राजनीतिक विद्रोह बनकर सामने आ चुकी है। राज्यसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने पार्टी की अंदरूनी सच्चाई को बेपर्दा कर दिया है। दलित चेहरे के तौर पर उतारे गए उम्मीदवार Karambir Boudh की जीत जितनी अहम है, उससे कहीं ज्यादा यह इस बात का संकेत बन गई है कि पार्टी के भीतर ही उनके खिलाफ एक संगठित मोर्चा खड़ा था। यह जीत केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि अपने ही खेमे की साजिशों को मात देने की कहानी बनकर उभरी है, जिसने कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
16 मार्च को हुए मतदान में कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या होने के बावजूद जो नतीजे सामने आए, उन्होंने पूरे राजनीतिक माहौल को झकझोर दिया। पांच क्रॉस वोट, चार वोटों का रद्द होना और कुछ विधायकों की संदिग्ध भूमिका साफ संकेत देती है कि मामला सिर्फ तकनीकी चूक का नहीं, बल्कि सुनियोजित भीतरघात का था। निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल को महज तीन वोटों से हराकर बौद्ध की जीत ने यह भी साबित कर दिया कि अगर थोड़ी और चूक होती, तो कांग्रेस को एक और करारी हार का सामना करना पड़ सकता था। यह स्थिति इस हद तक पहुंच गई थी कि पार्टी को अपने ही विधायकों के रुख पर भरोसा नहीं रह गया था।
सूत्रों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में उंगलियां सीधे Kumari Selja के खेमे की ओर उठ रही हैं। आरोप है कि सैलजा गुट ने शुरुआत से ही बौद्ध की उम्मीदवारी को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग के जरिए उन्हें हराने की कोशिश की। इतना ही नहीं, कुछ विधायकों को वोटिंग से दूर रखने और कुछ के वोट अमान्य कराने की रणनीति भी इसी खेमे से जुड़ी बताई जा रही है। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि पार्टी के खिलाफ खुला राजनीतिक विद्रोह माना जाएगा।
इस पूरे संकट के बीच पूर्व मुख्यमंत्री Bhupinder Singh Hooda की भूमिका निर्णायक रही। उनकी रणनीति और राजनीतिक पकड़ ने हालात को संभाला और अंततः बौद्ध की जीत सुनिश्चित की। हालांकि यह भी उतना ही स्पष्ट है कि अगर पार्टी के भीतर एकजुटता होती, तो यह जीत इतनी कठिन नहीं होती। इसके उलट, कांग्रेस को अपनी ही सीट बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा, जबकि दूसरी सीट भाजपा के खाते में अपेक्षाकृत आसानी से चली गई। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि नुकसान केवल एक सीट का नहीं, बल्कि संगठन की साख का भी हुआ है।
यह पहली बार नहीं है जब हरियाणा कांग्रेस को भीतरघात का सामना करना पड़ा हो। पिछले राज्यसभा चुनावों में भी इसी तरह की क्रॉस वोटिंग ने पार्टी को हार का स्वाद चखाया था। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मामला खुलकर सामने आया है और आरोप सीधे वरिष्ठ नेतृत्व तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—क्या कांग्रेस अब भी इस समस्या को नजरअंदाज कर सकती है, या फिर सख्त कार्रवाई का समय आ चुका है?
अब नजरें पार्टी हाईकमान पर टिक गई हैं, खासकर Rahul Gandhi और संगठन महासचिव K. C. Venugopal पर, जिनके सामने यह सबसे बड़ी संगठनात्मक चुनौती बनकर उभरी है। पार्टी के भीतर से उठ रही आवाजें साफ कह रही हैं कि अगर इस बार भी कार्रवाई नहीं हुई, तो हरियाणा में कांग्रेस का भविष्य और कमजोर हो जाएगा। यह मामला अब सिर्फ अनुशासन का नहीं, बल्कि पार्टी की विश्वसनीयता और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।
कांग्रेस इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक रास्ता सख्त निर्णय लेकर संगठन को मजबूत करने का है, जबकि दूसरा रास्ता गुटबाजी को नजरअंदाज कर धीरे-धीरे राजनीतिक जमीन खोने का। हरियाणा का यह घटनाक्रम अब केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की क्षमता और अनुशासन की परीक्षा बन चुका है। अब देखना यह है कि कांग्रेस नेतृत्व इस चुनौती का सामना कैसे करता है—निर्णायक कार्रवाई के साथ या फिर खामोशी के जरिए।




