एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 13 फरवरी
लोकसभा के बजट सत्र के बीच जिस विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव को लेकर पिछले कई दिनों से सियासी तापमान बढ़ा हुआ था, उस पर अब बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। सूत्रों के अनुसार सत्तारूढ़ दल की ओर से नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया गया है। यह वही प्रस्ताव था जिसकी चर्चा संसद के भीतर और बाहर लगातार हो रही थी और जिसे लेकर सरकार तथा विपक्ष के बीच तीखा टकराव देखने को मिल रहा था।
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब बीजेपी सांसद Nishikant Dubey ने राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त करने तथा उनके आचरण को लेकर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं। इसके बाद यह संकेत मिला था कि संसद में विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। विशेषाधिकार प्रस्ताव संसद की उस प्रक्रिया से जुड़ा होता है जिसके तहत किसी सांसद पर सदन की गरिमा या नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है और दोष सिद्ध होने पर कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। यही कारण था कि इस संभावित कदम को राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
राहुल गांधी हाल के दिनों में सरकार पर कई मोर्चों पर हमलावर रहे हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय ट्रेड डील, किसानों के हित, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों और पूर्व थलसेनाध्यक्ष M. M. Naravane की पुस्तक में दर्ज टिप्पणियों को लेकर सवाल उठाए थे। इसके अतिरिक्त तथाकथित ‘एपिस्टिन फाइल’ और विदेश नीति के कुछ पहलुओं पर भी उन्होंने सरकार से जवाब मांगा था। बीजेपी का आरोप था कि राहुल गांधी के कुछ बयान तथ्यों से परे हैं और संसद की मर्यादा के अनुरूप नहीं हैं, जबकि कांग्रेस का कहना है कि विपक्ष का काम सवाल उठाना है और यही लोकतंत्र की आत्मा है।
अब जब विशेषाधिकार प्रस्ताव को आगे न बढ़ाने का निर्णय सामने आया है, तो राजनीतिक हलकों में इसे रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। बीजेपी के भीतर यह तर्क दिया जा रहा है कि संसद का कामकाज सुचारु रूप से चलाना प्राथमिकता है और अनावश्यक गतिरोध से बचना चाहिए। वहीं कांग्रेस और विपक्षी दल इसे अपनी नैतिक जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार दबाव में पीछे हटी है और सवालों का सामना करने के बजाय दमन की राह पर चल रही थी।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संसद के भीतर टकराव की राजनीति आने वाले समय में और तेज हो सकती है। एक ओर बीजेपी इसे अनुशासन और मर्यादा का प्रश्न बता रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विपक्ष के अधिकारों से जोड़ रही है। फिलहाल विशेषाधिकार प्रस्ताव का मुद्दा ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है, लेकिन इससे उपजा राजनीतिक तनाव अभी समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर बहस किस दिशा में जाती है, इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी।




