अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो 30 अक्टूबर 2025
ब्राजील की राजधानी रियो डी जेनेरियो इन दिनों भय और सन्नाटे में डूबी है। देश के इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे खूनी पुलिस कार्रवाई में अब तक 132 लोगों की मौत हो चुकी है। यह कार्रवाई रियो के उत्तरी हिस्से में स्थित फेवालाओं — यानी झुग्गी बस्तियों — में चलाई गई थी, जहाँ कुख्यात ड्रग गैंग Comando Vermelho (रेड कमांड) का दबदबा माना जाता है। पुलिस और सैन्य बलों की इस संयुक्त कार्रवाई में हजारों जवान शामिल थे, बख्तरबंद वाहन, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया। इस ऑपरेशन का उद्देश्य था ड्रग नेटवर्क को तोड़ना और उन इलाकों को सरकारी नियंत्रण में लाना, जो वर्षों से अपराधियों के कब्जे में थे।
यह अभियान तड़के सुबह शुरू हुआ जब फेवालाओं में सुरक्षा बलों ने चारों ओर से घेराबंदी कर ली। स्थानीय लोगों के अनुसार, गोलीबारी कई घंटों तक चलती रही। कई शव सड़कों पर पड़े रहे, जबकि पुलिस ने दावा किया कि सभी मृतक अपराधी थे या गैंग से जुड़े हुए थे। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और नागरिक समूहों का कहना है कि मारे गए कई लोग निर्दोष नागरिक थे, जिन्हें किसी सुनवाई या आत्मसमर्पण का मौका नहीं दिया गया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और तस्वीरों में देखा जा सकता है कि महिलाएँ और बच्चे भय के माहौल में अपने घरों में दुबके हुए हैं। कुछ इलाकों में अब भी धुएँ और बारूद की गंध फैली हुई है।
राज्य के गवर्नर क्लॉडियो कास्त्रो ने इस अभियान का बचाव करते हुए कहा है कि यह “नार्को-टेररिज़्म के खिलाफ युद्ध” है और रियो राज्य को अपराधियों से मुक्त कराना जरूरी था। उन्होंने कहा कि ड्रग गिरोहों ने न केवल लोगों के जीवन को बंधक बना रखा था, बल्कि पुलिस पर लगातार हमले कर रहे थे। दूसरी ओर, संघीय सरकार ने इस कार्रवाई की आलोचना की है और कहा है कि इतनी बड़ी सैन्य कार्रवाई के बारे में उन्हें पूर्व में कोई जानकारी नहीं दी गई थी। इस विवाद ने ब्राजील की राजनीति में भी भूचाल ला दिया है।
मानवाधिकार संगठनों ने इसे “राज्य-प्रायोजित नरसंहार” कहा है। अल जज़ीरा, द गार्जियन और वाशिंगटन पोस्ट जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स ने बताया है कि शवों की गिनती लगातार बढ़ रही है और कई इलाकों में स्थानीय नागरिक अब भी लापता हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह कार्रवाई मानवता के सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होती है। उनके अनुसार, अपराध से लड़ना जरूरी है, लेकिन इस तरह की कार्रवाई में नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इस घटना का व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव देखने को मिल रहा है। फेवालाओं के लोग — जो पहले से ही गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता से जूझ रहे हैं — अब मानसिक और भावनात्मक आघात का सामना कर रहे हैं। कई परिवार अपने प्रियजनों की तलाश में अस्पतालों और मुर्दाघरों के चक्कर काट रहे हैं। स्कूल, बाजार और सार्वजनिक जीवन पूरी तरह ठप हो चुका है। स्थानीय एनजीओ और चर्च संस्थाएँ राहत और पुनर्वास के प्रयास कर रही हैं, लेकिन भय और अविश्वास का माहौल अब भी गहरा है।
भारत के संदर्भ में यह घटना एक गहरी चेतावनी के रूप में देखी जा सकती है। यह दिखाती है कि अपराध नियंत्रण के नाम पर अगर राज्य केवल बल-प्रयोग पर निर्भर हो जाए, तो मानवाधिकार, न्याय और पारदर्शिता की अवधारणाएँ पीछे छूट जाती हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहाँ समाज बहुस्तरीय और विविध है, इस तरह के “ऑपरेशन मॉडल” की नकल खतरनाक साबित हो सकती है। किसी भी देश में कानून-व्यवस्था का असली उद्देश्य केवल अपराधियों का खात्मा नहीं, बल्कि समाज में भय के बजाय विश्वास पैदा करना होना चाहिए।
ब्राजील की यह पुलिस कार्रवाई अब एक वैश्विक बहस का केंद्र बन चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक फेवालाओं में रहने वाले गरीब और हाशिये पर पड़े लोगों को शिक्षा, रोज़गार और सम्मानजनक जीवन के अवसर नहीं मिलते, तब तक ड्रग माफिया जैसी शक्तियाँ वहीं से नए अपराधियों को जन्म देती रहेंगी। अपराध से लड़ाई केवल बंदूक से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, पुनर्वास और पारदर्शी शासन से जीती जाती है।
132 मौतों वाला यह “ऑपरेशन” अब ब्राजील के लिए केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि राज्य और समाज के रिश्ते की एक गहरी परीक्षा बन गया है। क्या यह कार्रवाई कानून का राज स्थापित करेगी या फिर नए अविश्वास और हिंसा के बीज बो जाएगी — इसका जवाब आने वाले दिनों में ब्राजील की सड़कों से मिलेगा।




