सरोज सिंह। पटना 9 दिसंबर 2025
बिहार की सियासत एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में प्रवेश करती दिख रही है, जहां यह चर्चा अचानक पूरे राज्य में आग की तरह फैल गई है कि मुख्यमंत्री नितीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक एंट्री अब सिर्फ दूर की संभावना नहीं, सत्ता-समीकरणों का हिस्सा बन चुकी है। यह अटकलें तब और तेज हो गईं जब राजनीतिक गलियारों में यह सुगबुगाहट सुनाई दी कि आने वाले महीनों में निशांत को बिहार का डिप्टी मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, जबकि मुख्यमंत्री की कुर्सी बीजेपी के खाते में जाने की तैयारी हो रही है। यह संभावित “सत्ता-विनिमय फार्मूला” राज्य की राजनीति में हलचल मचा रहा है, क्योंकि यह संकेत देता है कि जेडीयू और बीजेपी के बीच कोई बड़ी अंदरूनी डील आकार ले रही है—जिसका उद्देश्य 2025 और आगे की सियासत को स्थिर करना, परिवार की राजनीतिक विरासत को सुरक्षित रखना और बीजेपी की रणनीतिक पकड़ मजबूत करना है।
निशांत कुमार को लेकर यह भी दिलचस्प है कि वे राजनीति से हमेशा दूरी बनाए रखने वाले सार्वजनिक व्यक्तित्व रहे हैं। नितीश कुमार ने बार-बार कहा है कि उनका बेटा राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं रखता, लेकिन अब यह दावा बदलती परिस्थितियों में सवालों के घेरे में है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नितीश कुमार, जिन्होंने पिछले दस वर्षों में कई बार राजनीतिक पाला बदला, अब अपनी पार्टी और अपने परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए एक नए रास्ते पर चल पड़े हैं। जेडीयू की घटती ताकत, बीजेपी की बढ़ती आक्रामकता, राजद की जमीनी पकड़ और बिहार में बदलता जनसांख्यिकीय संतुलन—ये सभी कारण मिलकर नितीश कुमार को मजबूर कर सकते हैं कि वे अपनी ‘लिगेसी पॉलिटिक्स’ की शुरुआत करें, जिसमें पहला चेहरा उनके पुत्र निशांत ही बन सकते हैं।
यह भी चर्चा का विषय है कि यदि बीजेपी भविष्य में अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है, तो उसे जेडीयू के सहयोग की सख्त जरूरत है। ऐसे में “सीएम बीजेपी का—डिप्टी सीएम निशांत कुमार” जैसा फार्मूला दोनों दलों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है। बीजेपी राज्य में अपना चेहरा स्थापित कर पाएगी, वहीं नितीश कुमार अपने बेटे को नए राजनीतिक परिदृश्य में सुरक्षित स्थान दे सकेंगे। यह ‘ट्रांजिशनल पावर मॉडल’ खूब चर्चा में है, जिसके तहत नितीश धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से पीछे हटेंगे लेकिन सत्ता की आखिरी डोर निशांत के हाथ में छोड़ेंगे, जिससे नितीश के प्रभाव और नेटवर्क का फायदा भविष्य में भी मिलता रहे।
राजनीतिक हलकों में यह बात भी जोर पकड़ रही है कि बीजेपी को बिहार में स्थिर चेहरा चाहिए—ऐसा नेता जो लंबे समय तक सत्ता और संगठन के बीच पुल की भूमिका निभा सके। इस संदर्भ में निशांत कुमार एक सुरक्षित, नियंत्रित और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देखे जा रहे हैं, क्योंकि वे न तो विवादों में घिरे हैं, न ही किसी गुटबाजी से जुड़े हुए युवा नेता। उनके आने से जेडीयू में भी ऊर्जा आएगी, क्योंकि पार्टी पिछले कुछ वर्षों से आंतरिक खींचतान और गिरते जनाधार से जूझ रही है। कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि निशांत का प्रवेश जेडीयू को भावनात्मक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर नई शक्ति दे सकता है, जैसा राजद में तेजस्वी यादव के आने पर हुआ था।
यदि यह राजनीतिक फॉर्मूला सच साबित होता है तो यह बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा पुनर्संरचना अभियान होगा। यह गठजोड़ कई नए सवाल खड़े करेगा—क्या राजद और कांग्रेस इसके बाद अपना गठबंधन और मजबूत करेंगे? क्या भाजपा निशांत के साथ मिलकर बिहार के सामाजिक समीकरणों को नया आकार देगी? क्या यह बदलाव 2025 विधानसभा चुनावों से पहले लागू होगा या इसके लिए कोई ‘मौके की राजनीति’ का इंतजार है? इतना तय है कि यह अटकलें सिर्फ अफवाह नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेतों, चुप्पियों और मुलाकातों का परिणाम हैं, जो चुपचाप नया सियासी नक्शा बना रही हैं।
बिहार की राजनीति में यह अभी सिर्फ शुरुआत है। नितीश कुमार, जो अक्सर अप्रत्याशित निर्णयों से पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करते आए हैं, यदि एक बार फिर किसी बड़े “U-टर्न-प्लस-ट्रांजिशन” की तरफ बढ़ते हैं, तो निशांत कुमार की एंट्री वही भूकंप हो सकती है जिसकी शुरुआत होती दिख रही है। राज्य में हर राजनीतिक दल, हर रणनीतिकार और हर समर्थक अब एक ही सवाल पूछ रहा है—क्या निशांत कुमार सच में बिहार की सत्ता के अगले बड़े खिलाड़ी बनने वाले हैं?




