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BJP & EC : “वोट चोरी का महामंत्रालय” — बिहार से दिल्ली तक फैली फर्जी वोटर फैक्ट्री, सैंया कोतवाल तो डर काहे का

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“वोट चोरी का महामंत्रालय” — यही सटीक नाम है उस गठजोड़ का जो आज भारतीय लोकतंत्र के माथे पर कलंक बन चुका है। बिहार से दिल्ली तक फैली यह फर्जी वोटर फैक्ट्री अब किसी अंधेरे कमरे की साजिश नहीं, बल्कि सत्ता के संरक्षण में चलने वाली खुली दुकान बन गई है। बीजेपी और चुनाव आयोग के बीच की यह अघोषित साझेदारी लोकतंत्र की बुनियाद को खोखला कर रही है, जहां नियमों की किताबें सिर्फ विपक्ष के लिए खोली जाती हैं और सत्ताधारी दल के लिए बंद कर दी जाती हैं। अशोक चौधरी की बेटी और एलजेपी सांसद शंभवी चौधरी की दो बार वोट डालने की वायरल तस्वीर इस सड़ांध का सिर्फ एक नमूना है — असली खेल इससे कहीं गहरा है, जहां सैंया कोतवाल खुद कानून का रखवाला नहीं, बल्कि उल्लंघन का आयोजक बन चुका है।

बिहार के चुनावों में भी यह खेल खुलकर खेला गया है। सूत्र बताते हैं कि बीजेपी ने अपने हजारों कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को पड़ोसी राज्यों — उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड और यहाँ तक कि दिल्ली से भी बिहार भेजा, ताकि वे “स्थानीय मतदाता” बन सकें। इन कार्यकर्ताओं को चुनाव से कुछ ही महीने पहले बिहार के अलग-अलग जिलों में “किराएदार”, “अस्थायी कर्मचारी” या “स्वयंसेवक” के रूप में दिखाया गया और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से इन्हें वोटर लिस्ट में जोड़ दिया गया। इस तरह हर विधानसभा क्षेत्र में हजारों नए वोटर बीजेपी के खाते में जुड़ गए। यह एक संगठित चुनावी हेराफेरी है जो लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर देती है, क्योंकि यह न केवल निष्पक्ष चुनाव की भावना का अपमान करती है बल्कि असली मतदाताओं की आवाज़ को भी दबा देती है।

यह “वोट चोरी” सिर्फ कुछ नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित नहीं है — यह एक पूरा तंत्र है जो हर राज्य में एक ही पैटर्न पर काम करता है। बीजेपी के आईटी सेल से लेकर स्थानीय स्तर के प्रशासनिक अधिकारी तक, सब इस योजना का हिस्सा बन जाते हैं। इस खेल से बीजेपी को हर करीबी सीट पर कम से कम तीन से चार हजार वोटों का अतिरिक्त फायदा मिल जाता है। यही वह अंतर है जो कई बार हार और जीत के बीच का फैसला तय करता है। जब विपक्ष के उम्मीदवारों की जीत सिर्फ कुछ हजार वोटों से तय होती है, तो यह “वोट चोरी” सीधे लोकतांत्रिक जनादेश को बदल देती है। ऐसे में जो सरकार बनती है, वह जनता की नहीं बल्कि हेराफेरी की जीत होती है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग की भूमिका इसमें संदिग्ध नज़र आती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ग्यानेश कुमार पर आरोप है कि वे जानबूझकर वोटर लिस्ट की de-duplication प्रक्रिया यानी डुप्लीकेट मतदाताओं को हटाने की प्रक्रिया को रोकते हैं। यह वही प्रक्रिया है जिससे यह पता चल सकता है कि कोई व्यक्ति दो राज्यों या दो अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ वोटर तो नहीं है। लेकिन चुनाव आयोग इस पर कोई गंभीर कदम नहीं उठाता। और जब विपक्ष डिजिटल वोटर लिस्ट मांगता है ताकि उसकी स्वतंत्र जांच की जा सके, तब आयोग यह कहकर मना कर देता है कि “यह गोपनीय जानकारी है।” असल में यह गोपनीयता नहीं, बल्कि सच्चाई छिपाने की साजिश है। अगर डिजिटल वोटर लिस्ट खुले स्रोत में दे दी जाए, तो यह “वोट चोरी” तुरंत उजागर हो जाएगी — और शायद यही कारण है कि आयोग पारदर्शिता से डरता है।

वोटर लिस्ट में नाम जोड़े जाने का काम चुनाव से कुछ दिन पहले तक जारी रहता है। इसका मकसद स्पष्ट है — विपक्ष के पास इतना समय ही न रहे कि वह जांच सके कि कौन से नाम असली हैं और कौन से फर्जी। जब उम्मीदवार नामों की समीक्षा करते हैं, तब तक आयोग अपडेट जारी करता रहता है, और नए नाम आते जाते हैं। इस प्रक्रिया में विपक्ष को भ्रम में रखा जाता है और बीजेपी का “सपोर्ट बेस” बढ़ता जाता है। यह एक अत्यंत चालाक और योजनाबद्ध रणनीति है — जो कागज़ी रूप में पूरी तरह कानूनी दिखती है, लेकिन व्यवहार में लोकतंत्र की हत्या करती है।

यह भी कहा जा रहा है कि यह सब चुनाव आयोग के अंदर मौजूद कुछ निजी तकनीकी कंपनियों के माध्यम से होता है। ग्यानेश कुमार और उनकी तथाकथित “VC कंपनी” पर यह आरोप है कि उन्होंने वोटर डेटाबेस के साथ छेड़छाड़ की सुविधा दी है, ताकि बीजेपी के लिए वांछित नाम आसानी से जोड़े जा सकें। यह सिर्फ “वोट चोरी” नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा डेटा फ्रॉड है। जब लोकतंत्र के प्रहरी ही सत्ता की सहायता में लग जाएं, तो फिर निष्पक्षता सिर्फ किताबों में रह जाती है।

सच यह है कि वोट चोरी किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए सबसे बड़ा अपराध है, क्योंकि यह जनता की इच्छा को सत्ता की चाल में बदल देता है। जो वोटर अपनी उम्मीदों के साथ बूथ तक जाता है, उसकी आवाज़ को कोई अदृश्य हाथ अपने लाभ के लिए बदल देता है। यह किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ अपराध है। इसीलिए जब राकेश सिन्हा जैसे लोग पकड़े जाते हैं, तो वे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोल देते हैं।

ग्यानेश कुमार और उनकी प्रणाली द्वारा बीजेपी को फायदा पहुँचाने की यह रणनीति भारत के लोकतंत्र पर अब तक का सबसे बड़ा धब्बा है। यह सिर्फ एक चुनावी गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक अपराध है — जिसमें तकनीक, सत्ता और प्रशासनिक तंत्र सब एकजुट होकर जनता के जनादेश के साथ धोखा करते हैं। लोकतंत्र का अर्थ है “जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए” — लेकिन अगर जनता की गिनती ही चोरी हो जाए, तो फिर यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि संगठित ठगी रह जाती है।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या भारत में अब भी जनता वोट डाल रही है या सिर्फ आंकड़ों का हिस्सा बन रही है? जब तक यह “वोट चोरी” नहीं रुकेगी, तब तक हर चुनाव की वैधता पर सवाल उठते रहेंगे। और अगर एक बार जनता का भरोसा टूट गया, तो फिर यह भरोसा किसी आयोग या सरकार से नहीं, बल्कि सच के पुनर्जन्म से ही लौटेगा।

 

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