अरिंदम चक्रवर्ती । कोलकाता 27 नवंबर 2025
भारतीय राजनीति में ममता बनर्जी आज उस अदम्य प्रतिरोध और अटूट जनाधार का नाम बन चुकी हैं, जिसने पिछले कई वर्षों से बीजेपी के सामने लगातार चुनौती खड़ी की है। बीजेपी का संगठनात्मक विस्तार, हिंदुत्व की भावनात्मक राजनीति, केंद्रीय एजेंसियों की ताकत और चुनावी प्रबंधन की उच्च क्षमता—इन सबका प्रयोग बंगाल में बार-बार हुआ, लेकिन हर बार भाजपा को वैसा ही अनुभव मिला जैसा गर्म चूल्हे पर हाथ छू देने पर मिलता है। बंगाल में ममता बनर्जी ने वह राजनीतिक क्षमता दिखाई है जो किसी भी केंद्र-प्रभुत्व वाली पार्टी को याद दिलाती है कि भारत संघीय ढांचा है, कोई अधीनस्थ प्रदेश नहीं। बीजेपी के सर्वशक्तिशाली नेतृत्व का सामना करने के बावजूद वह अपने दम पर, अकेले, बिना किसी राष्ट्रीय गठबंधन के भी, उस तट पर खड़ी रहीं जहाँ से कोई भी दूसरी पार्टी वर्षों तक नहीं टिक सकी। बंगाल की जनता ने उन्हें बार-बार यह ताकत दी और यही वह प्रतिरोध है जिसने बीजेपी को नाकों चने चबाने पर मजबूर किया है। ममता खुल कर कहती हैं
बीजेपी, मेरे साथ खेल खेलने की कोशिश मत करो, क्योंकि तुम मेरा मुकाबला कर ही नहीं पाओगे।
बीजेपी की सबसे बड़ी हार यह रही है कि वह चाहे जितना ध्रुवीकरण कर ले, चाहे जितना ‘डबल इंजन’ का वादा कर ले—बंगाल की जनता ने ममता बनर्जी के साथ अपनी आत्मा का रिश्ता कायम रखा है। 2021 के विधानसभा चुनावों में जब भाजपा ने 200 सीटों का दावा किया और देश की आधी कैबिनेट बंगाल में डेरा डाले बैठी थी, तब भी नतीजे ममता के पक्ष में भारी बहुमत में गए। यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी; यह अक्खड़, साहसी और जनहितैषी राजनीति की वह जीत थी जिससे दिल्ली के सत्ता गलियारे हिलकर रह गए। यही कारण है कि आज ममता बनर्जी जब खुलकर कहती हैं—“बीजेपी, मेरे साथ खेल खेलने की कोशिश मत करो, क्योंकि तुम मेरा मुकाबला कर ही नहीं पाओगे।” तो यह सिर्फ आत्मविश्वास नहीं बल्कि एक स्थापित सत्य है जिसे बंगाल की जनता ने बार-बार सिद्ध किया है।
लेकिन अब राजनीतिक लड़ाई पूरी तरह बदल चुकी है। ध्रुवीकरण, धनबल और एजेंसियों के प्रयोग से जब बात नहीं बनी, तो अब बीजेपी और उसके ‘सहयोगी संस्थान’ चुनाव आयोग पर नए प्रकार के ऑपरेशन चला रहे हैं—SIR (Special Intensive Revision)। यह मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया होनी चाहिए थी, लेकिन जिस तेजी और जिस मनोवृत्ति के साथ इसे बंगाल में लागू किया जा रहा है, उससे ममता बनर्जी का आरोप सही प्रतीत होता है कि यह लोकतंत्र में जनता की भूमिका को कमजोर करने का प्रयास है। उन्होंने बिल्कुल सही कहा—
“जो लोग सालों से यहां रहते हैं, जिन्होंने वोट दिया है, जो राज्य की योजनाओं के लाभार्थी हैं—आप उन्हें खत्म नहीं कर सकते।”
मतदाता सूची से लाखों वैध नाम हटाना सिर्फ तकनीकी त्रुटि नहीं—यह एक बहुत बड़ा राजनीतिक खेल है, ताकि चुनावी समीकरण बदलें और सरकार को ‘जनादेश’ नहीं, बल्कि ‘डेटाबेस’ के जरिए गिराया जा सके।
बीजेपी की यह रणनीति बंगाल तक सीमित नहीं है। देश भर में विपक्षी राज्यों को गिराने का एक व्यवस्थित पैटर्न उभरकर सामने आया है। बिहार में तेजस्वी यादव के महागठबंधन को तोड़ने में जो राजनीतिक ऑपरेशन लागू हुआ, उसने साफ कर दिया कि बीजेपी का लक्ष्य सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि विपक्ष शासित राज्यों को किसी भी कीमत पर बेदखल करना है। महाराष्ट्र में चुनी हुई सरकार को गिराया गया; कर्नाटक में तनाव लगातार बनाए रखा गया; तेलंगाना में हर कीमत पर सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित किया गया; और तमिलनाडु में स्टालिन सरकार को कमजोर करने के लिए जांच एजेंसियाँ महीनों से सक्रिय हैं। यह कोई संयोग नहीं है—यह एक राष्ट्रीय अभियान है, जिसकी जड़ें सत्ता पर स्थायी कब्ज़े की भूख में हैं।
ममता बनर्जी इस राष्ट्रीय पैटर्न को सबसे पहले समझने और सार्वजनिक रूप से उजागर करने वाली नेता हैं। जब वह कहती हैं कि चुनाव आयोग अब “Election Commission नहीं, BJP Commission बन चुका है”, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस चिंता का स्वरूप है जिसे देश के हर विपक्षी राज्य ने महसूस किया है। चुनाव आयोग का काम निष्पक्षता है, लेकिन आज वह मतदाता सूची तय करने से लेकर बूथों की संरचना तक, हर जगह संदिग्ध राजनीतिक झुकाव का प्रतीक बन गया है। ममता का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह सिर्फ बंगाल की मुखर आवाज़ नहीं—बल्कि संघीय भारत की सामूहिक चेतावनी हैं।
बीजेपी के टॉप-डाउन और सत्ता-केंद्रित राजनीतिक मॉडल के सामने ममता एक grassroots नेता हैं। उनकी राजनीति सड़क के संघर्ष से जन्मी है, कोई रिसॉर्ट-पॉलिटिक्स का उत्पाद नहीं। बंगाल में उनकी विश्वसनीयता सिर्फ विकास योजनाओं से नहीं, बल्कि उस संघर्षशील व्यक्तित्व से आती है जिसने जनता के हर दुख-दर्द को साझा किया। यही कारण है कि ममता ने जब कहा—
“People want security of livelihood, democracy and dignity.”
तो यह सिर्फ भाषण नहीं था; यह बंगाल के हर गरीब, हर महिला, हर युवा, हर किसान की वास्तविक आकांक्षा थी।
आज SIR की आड़ में जो खेल खेला जा रहा है, वह केवल एक राज्य का मुद्दा नहीं—यह भारत की लोकतांत्रिक आत्मा की परीक्षा है। अगर मतदाता सूची डिजिटल तलवार बनकर जनता के अधिकारों को छीनने का काम करेगी, तो फिर चुनाव जनता नहीं बल्कि सत्ता तय करेगी। यह लोकतंत्र नहीं—नियोजित प्रबंधन की राजनीति है। लेकिन ममता बनर्जी इस राजनीति की सबसे बड़ी बाधा हैं। वह भारतीय राजनीति की वह चट्टान हैं, जिसके सामने बीजेपी की हर लहर टूटकर वापस लौट गई है।
आज के दौर में जब संघीय ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है, संस्थाओं की स्वतंत्रता संदिग्ध हो रही है और चुनावी प्रक्रियाएँ सत्ता का औजार बन रही हैं—ममता बनर्जी जैसी आवाज़ें लोकतंत्र की आशा हैं। वह सिर्फ बंगाल की नेता नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति का वो स्तंभ हैं जो यह याद दिलाता है कि भारत की असली ताकत जनता है, न कि सत्ता।
भारत की राजनीतिक लड़ाई जारी है—लेकिन यह तय है कि बीजेपी के मार्ग में सबसे अडिग, सबसे जिद्दी और सबसे मजबूत पहाड़ आज भी ममता बनर्जी ही हैं।




