Home » National » 35 करोड़ का BJP-निर्मित स्लॉटर हाउस और 26 टन गोमांस: भोपाल में सत्ता हर स्तर पर, फिर भी जवाबदेही गायब क्यों?

35 करोड़ का BJP-निर्मित स्लॉटर हाउस और 26 टन गोमांस: भोपाल में सत्ता हर स्तर पर, फिर भी जवाबदेही गायब क्यों?

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

परवेज खान | भोपाल 10 जनवरी 2026

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सामने आया मामला सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सत्ता, नैरेटिव और चयनात्मक आक्रोश की राजनीति पर सीधा सवाल है। भोपाल नगर निगम द्वारा 35 करोड़ रुपए की लागत से बनाए गए जिस आधुनिक स्लॉटर हाउस को विकास और आधुनिक व्यवस्था का प्रतीक बताया गया था, उसी से 26 टन मांस पकड़ा गया, जिसकी जांच रिपोर्ट में गोमांस होने की पुष्टि हुई है। हैरानी की बात यह है कि यह स्लॉटर हाउस महज़ एक महीने पहले ही शुरू किया गया था, और इतने कम समय में इतनी बड़ी मात्रा में गोमांस का निकलना पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान खड़े करता है।

इस मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि भोपाल नगर निगम BJP के नियंत्रण में है, मध्य प्रदेश में BJP की सरकार है और केंद्र में भी BJP सत्ता में है। यानी प्रशासन, नीति और निगरानी—तीनों स्तरों पर एक ही पार्टी की जिम्मेदारी बनती है। इसके बावजूद, गोमांस जैसा संवेदनशील मुद्दा इतने बड़े पैमाने पर सामने आना यह बताता है कि या तो निगरानी व्यवस्था पूरी तरह फेल रही, या फिर सब कुछ जानते-समझते हुए अनदेखा किया गया। सवाल यह भी है कि 35 करोड़ की सार्वजनिक परियोजना में नियमों की पालना की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी।

जांच से जुड़े तथ्यों के अनुसार, यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी। 22 दिन पहले स्लॉटर हाउस से निकल रही एक गाड़ी को रोका गया था और नमूने जांच के लिए भेजे गए थे। अब आई रिपोर्ट में गोमांस होने की पुष्टि हुई है। यानी गतिविधियां लगातार चल रही थीं और प्रशासन के पास समय भी था कि वह सख्त कार्रवाई करता। शहर में रोज़ 80 से अधिक मृत मवेशियों के मिलने और उनके निपटान की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। नियमों के मुताबिक गाय के शवों के निस्तारण और अन्य पशुओं के मांस प्रसंस्करण की अलग-अलग व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन यहां पूरी प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में दिखती है।

रिपोर्ट सार्वजनिक होते ही हिंदू संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया और पुलिस कमिश्नर कार्यालय का घेराव किया। इसके बाद नगर निगम और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में स्लॉटर हाउस को सील किया गया और संचालन से जुड़े लोगों पर कार्रवाई की बात कही गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नगर निगम, राज्य सरकार और केंद्र—तीनों जगह BJP की सत्ता है, तो हिंदू संगठन विरोध किसके खिलाफ कर रहे थे? क्या यह विरोध सिर्फ एक ठेकेदार तक सीमित है, या फिर उस सिस्टम के खिलाफ, जिसने 35 करोड़ की परियोजना में इतनी बड़ी चूक होने दी?

यह सवाल इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि अगर यही घटना पश्चिम बंगाल या किसी विपक्ष-शासित राज्य में होती, तो नैरेटिव बिल्कुल अलग होता। तब क्या इसे “राज्य प्रायोजित गो-हत्या” नहीं कहा जाता? क्या राष्ट्रीय स्तर पर टीवी डिबेट, सोशल मीडिया ट्रेंड और केंद्रीय नेताओं के तीखे बयान नहीं आते? लेकिन जब मामला BJP-शासित भोपाल का है, तो चर्चा सीमित हो जाती है, भाषा नरम पड़ जाती है और जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या ठेकेदार तक सिमट जाती है।

दरअसल, यह मामला सिर्फ गोमांस या स्लॉटर हाउस का नहीं है। यह चयनात्मक आक्रोश और सुविधा के अनुसार बदले जाने वाले नैरेटिव का मामला है। अगर गाय आस्था और कानून का विषय है, तो वह हर राज्य में समान रूप से लागू होना चाहिए। और अगर कानून टूटा है, तो जवाबदेही सत्ता से शुरू होकर नीचे तक तय होनी चाहिए, न कि सिर्फ तब जब विपक्ष की सरकार हो।

भोपाल की यह घटना BJP के लिए एक कठिन आईना है। सवाल यह नहीं कि स्लॉटर हाउस सील हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि 35 करोड़ की सार्वजनिक परियोजना में यह सब कैसे हुआ, कितने समय तक हुआ और किसकी जानकारी में हुआ। अगर जवाबदेही सिर्फ विपक्ष के लिए आरक्षित है और सत्ता वाले राज्यों में चुप्पी ही नीति बन जाए, तो फिर यह सुशासन नहीं, बल्कि सुविधा का शासन कहलाएगा।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments