बिहार चुनाव 2025 के बाद राजनीतिक हलकों में जिस ‘बिहार मिरेकल’ की चर्चा हो रही है, वह किसी जीत की कहानी नहीं बल्कि चुनाव आयोग (ECI) के आंकड़ों में सामने आई चौंकाने वाली उलझनों का किस्सा है। यह मामला अब इतना गंभीर हो चुका है कि चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल खड़ा हो गया है। सवाल यह है कि मतदान के बाद आयोग ने ऐसे कौन से ‘कैल्कुलेशन चमत्कार’ किए कि गिने गए वोट मतदान से 1,77,673 ज़्यादा निकल आए? और आयोग को इतना बड़ा अंतर क्यों नहीं दिखा? यह गड़बड़ी मामूली नहीं—बल्कि पूरे चुनाव की नींव को हिला देने वाली है।
पहला सवाल इस बात से उठता है कि आयोग ने बिहार में ‘सफलतापूर्वक’ SIR पूरा करने के बाद 30 सितंबर 2025 को जारी प्रेस नोट (ECI/PN/313/2025) में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7.42 करोड़ बताई। चुनाव जैसे संवेदनशील विषय में आखिर “लगभग” शब्द का क्या काम? जब SIR पूरा होने का दावा किया जा चुका था, तो फिर मतदाताओं की सटीक संख्या बताने में क्या कठिनाई थी? यहीं से संदेह की शुरुआत होती है।
इसके बाद 6 अक्टूबर 2025 को जारी प्रेस नोट (ECI/PN/316/2025) में आयोग ने नई बाज़ी खेली—इस बार कुल मतदाताओं में 1,63,619 सर्विस वोटर्स जोड़ते हुए नया आंकड़ा 7,43,55,976 घोषित किया। यह दूसरा बदलाव था। जबकि आयोग इससे पहले SIR को “अंतिम आंकड़े” बता चुका था। अब सवाल यह है कि आख़िर ये संशोधन लगातार क्यों किए जा रहे थे?
11 नवंबर की प्रेस विज्ञप्ति (ECI/PN/351/2025) में कुल मतदाताओं का आंकड़ा फिर बदल दिया गया—अब यह संख्या 7,45,26,858 कर दी गई। और मतदान प्रतिशत बताया गया 66.91%। अगले ही दिन, 12 नवंबर को आयोग ने मतदान प्रतिशत में भी संशोधन करते हुए इसे 67.13% कर दिया। यानी मतदाता भी बदलते गए, मतदान प्रतिशत भी, लेकिन आयोग ने एक बार भी यह नहीं बताया कि राज्य में कुल कितने वोट पड़े।
जब विशेषज्ञों ने आयोग के दिए हुए मतदान प्रतिशत के आधार पर गणना की, तो 67.13% मतदान का मतलब हुआ—5,00,29,880 वोट। लेकिन जब सभी 243 सीटों के ECI द्वारा जारी आधिकारिक वोट काउंट का जोड़ लगाया गया, तो कुल वोट निकले—5,02,07,553। यानी मतदान से 1,77,673 वोट अधिक गिन लिए गए! यह सिर्फ अंतर नहीं—यह लोकतंत्र की जमीन को चीरती हुई विसंगति है।
अब सवालों की बरसात शुरू हो चुकी है—ECI ने अतिरिक्त 1,77,673 वोट गिने कैसे? क्या यह महज लापरवाही है? तकनीकी गलती? भारी प्रशासनिक नाकामी? या फिर चुनावी गणित में ऐसी अपारदर्शिता जिसने किसी एक राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाया? क्या यह सब ‘अनजाने’ में हुआ? या वोटरों को भ्रमित करने वाला एक सुनियोजित धुंधला पर्दा था?
यह मुद्दा और गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि चुनाव आयोग ने आज तक यह स्पष्ट नहीं किया कि राज्य में कुल कितने वोट पड़े। उसने न ही विधानसभा क्षेत्रवार कुल मतदान का आंकड़ा दिया। जब आयोग बारीकी से मतदान का प्रतिशत दे सकता है, तो फिर “कुल वोट” जैसे बुनियादी डेटा को छिपाने की क्या वजह थी? यह असामान्य है, संदिग्ध है और चुनावी पारदर्शिता की बुनियादी अपेक्षाओं के खिलाफ है।
अब सवाल यह भी उठता है—क्या इस चुनावी ‘चमत्कार’ से लाभ पाने वाली पार्टी वाकई इस गड़बड़ी से “अनजान” है? या फिर वह इस भ्रमपूर्ण माहौल में मिली “जनादेश की कृपा” को सहजता से स्वीकार कर रही है? प्रख्यात राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव भी कह चुके हैं कि—
“बिहार चुनाव के बाद जितनी बातें सामने आई हैं, उनमें यह विसंगति सबसे गंभीर है। चुनाव आयोग को इस पर जवाब देना ही होगा।”
इस पूरे मामले को सामने लाने में पारकला प्रभाकर और विभिन्न डेटा विश्लेषकों की भूमिका अहम रही है। अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है—क्या वह जवाब देगा? या चुप्पी को ही अपनी ढाल बनाए रखेगा? बिहार का यह ‘चमत्कार’ अब पूरे देश के लोकतांत्रिक ढांचे की कसौटी बन चुका है।




