बिहार की राजनीति में 2025 का चुनाव अब केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की नई परिभाषा तय करने वाला चुनाव बन गया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इस बार कुल 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। लेकिन इस घोषणा का असली महत्व केवल सीटों की संख्या में नहीं, बल्कि उस सामाजिक गणित में है जो तेजस्वी यादव ने इस बार हर स्तर पर लागू किया है। उन्होंने जातीय जनगणना को सिर्फ़ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दिशा बना दिया है। तेजस्वी यादव ने राजद के सबसे प्रतिष्ठित नारे — “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” — को नारे से आगे बढ़ाकर एक जीवंत राजनीतिक सिद्धांत के रूप में उतारा है।
तेजस्वी यादव का यह कदम इस मायने में ऐतिहासिक है कि इसमें पहली बार किसी बड़ी पार्टी ने अपनी सीट हिस्सेदारी को पूरी तरह जातीय जनगणना के अनुपात में गढ़ा है। राजद ने पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों को कुल 61 प्रतिशत सीटें दी हैं, जबकि इनकी आबादी बिहार में 64 प्रतिशत है। यानी यह प्रतिनिधित्व लगभग आनुपातिक है, जो राजनीतिक समानता की भावना को मजबूत करता है। इसी तरह, सवर्ण वर्ग जिसकी आबादी लगभग 14 प्रतिशत है, को 10 प्रतिशत सीटें दी गई हैं। दलित समुदाय, जिसकी आबादी लगभग 20 प्रतिशत है, को 15 प्रतिशत टिकट मिला है। वहीं, बिहार के मुस्लिम समाज की जनसंख्या 17 प्रतिशत के करीब है, और उन्हें 14 प्रतिशत सीटों पर प्रतिनिधित्व मिला है। यह अनुपात दर्शाता है कि तेजस्वी यादव ने सामाजिक संरचना का पूरा ध्यान रखा है और किसी वर्ग की उपेक्षा नहीं की है।
राजद के भीतर और बाहर, तेजस्वी यादव का यह कदम एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने इस घोषणा के साथ यह स्पष्ट कर दिया है कि अब राजनीति में सत्ता की हिस्सेदारी केवल वंशवाद या जातिवाद के आधार पर नहीं, बल्कि जनसंख्या और सामाजिक हक़ के आधार पर तय होगी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि तेजस्वी ने उम्मीदवारों के चयन में गहराई से यह देखा कि हर क्षेत्र में समाज का कौन-सा वर्ग अपने अधिकार से वंचित रहा है और उसे कैसे बराबरी का अवसर दिया जा सकता है। उन्होंने यादव, कुर्मी, कुशवाहा, निषाद, तेली, माली, नाई, लोहार और अति पिछड़ी जातियों को टिकट देकर यह संदेश दिया है कि राजद अब केवल एक समुदाय की पार्टी नहीं, बल्कि बिहार के हर वर्ग की आवाज़ बन चुकी है।
मुस्लिम उम्मीदवारों के संदर्भ में भी राजद ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। पार्टी ने उन सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी है जहाँ उनकी जनसंख्या निर्णायक भूमिका निभाती है, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित किया गया कि अन्य समुदायों में भी उनकी स्वीकृति बनी रहे। इस रणनीति का उद्देश्य केवल वोट जोड़ना नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और राजनीतिक एकीकरण को बढ़ावा देना है। तेजस्वी यादव ने अपने भाषणों में बार-बार यह कहा है कि बिहार की राजनीति अब “हम बनाम वे” की नहीं, बल्कि “सबके साथ, बराबरी के साथ” की राजनीति होगी।
तेजस्वी यादव का यह सामाजिक फार्मूला न केवल जातीय जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है, बल्कि यह राजनीतिक ईमानदारी का भी दस्तावेज़ बन गया है। उन्होंने जिस नारे को जनता के बीच फैलाया था, उसे उन्होंने टिकट वितरण के माध्यम से धरातल पर उतारा। यह बिहार की उस पुरानी राजनीति को चुनौती देता है जहाँ घोषणाएं अलग होती थीं और उम्मीदवार सूची किसी और समीकरण पर बनती थी। तेजस्वी यादव ने यह दिखाया कि राजनीति केवल भाषण नहीं, बल्कि संतुलन और समानता का अभ्यास भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव की यह रणनीति भाजपा और जदयू दोनों के लिए चुनौती बन सकती है। जातीय जनगणना को आधार बनाकर सीटों का वितरण करने से तेजस्वी ने एक गहरी सामाजिक लामबंदी की है। भाजपा जहाँ ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा देती है, वहीं तेजस्वी यादव ने सबकी हिस्सेदारी की ठोस व्याख्या दी है। एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, “तेजस्वी यादव ने पहली बार दिखाया है कि सामाजिक न्याय के नारे को केवल आदर्श नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक फार्मूले में बदला जा सकता है।”
राजद की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह सीट वितरण केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम है। तेजस्वी यादव का यह कहना कि “हमने जनगणना को रिपोर्ट नहीं, रास्ता बनाया है” — यह उस नयी राजनीति की घोषणा है जहाँ समाज की विविधता को सम्मान के साथ सत्ता की साझेदारी में बदला जाएगा।
आज जब राजनीति में नारे और वादे अक्सर हवा में खो जाते हैं, तेजस्वी यादव ने यह साबित किया है कि वह जो कहते हैं, वही करते हैं। राजद की यह सीट घोषणा बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ है — जहाँ प्रतिनिधित्व अब जातीय गणना से नहीं, बल्कि जनगणना से तय होगा।




