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बिहार चुनाव में भोजपुरी ब्रिगेड की धूम — मनोज तिवारी, मैथिली ठाकुर, पवन सिंह और खेसारी की गूंज

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बिहार में विधानसभा चुनाव का शोर अपने चरम पर है और इस बार की राजनीतिक जंग में एक नया उत्सव दिखाई दे रहा है— भोजपुरी संगीत का चुनावी विस्फोट। रैलियों और जनसभाओं में जहाँ भाषण और वादों की भरमार है, वहीं सुर, ताल, ढोलक और लोकगीतों ने इस राजनीतिक युद्ध को रंगीन बना दिया है। बिहार की लोकसंस्कृति का दम इस बार सबसे ऊँची आवाज़ में गूंज रहा है। राजनीतिक दलों ने समझ लिया है कि बिहार की असली धड़कन उसकी भाषाई जड़ों और सांस्कृतिक अस्मिता में बसती है, इसलिए चुनावी मंच अब लोकनृत्य और गीतों की जीवंत प्रस्तुति से भरे पड़े हैं। जनता को आकर्षित करने और भावनात्मक जोड़ बनाने की यह रणनीति चुनावी समीकरणों को नए सिरे से प्रभावित कर रही है।

बीजेपी की ओर से कई बड़ी हस्तियाँ मैदान में दिख रही हैं। मनोज तिवारी, पवन सिंह और दिनेश लाल ‘निरहुआ’ अपने सुपरहिट गानों और स्टारडम के दम पर भारी भीड़ खींच रहे हैं। उनके कार्यक्रमों में इतना जोश उमड़ पड़ता है कि वहां मौजूद लोग सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष राजनीतिक समर्थन में बदलते दिखाई देते हैं। भोजपुरी तरानों के बीच “बिहार बनेगा नंबर-1” जैसे संदेश, पहली बार वोट देने वाले युवाओं को खास तरीके से लुभा रहे हैं। बीजेपी को भरोसा है कि भोजपुरी संगीत की जड़ों से बना यह भावनात्मक रिश्ता सीधे वोटों में तब्दील हो सकता है।

उधर महागठबंधन भी पूरी तैयारी में है और उसके मंचों पर भी भोजपुरी का अलग रंग बिखर रहा है। लोकसंगीत की अमिट पहचान मैथिली ठाकुर अब राजनीति में उतर चुकी हैं और अपने सधे सुरों और शालीन छवि के साथ सभाओं में नई ऊर्जा भर रही हैं। इसके अलावा खेसारी लाल यादव और कई क्षेत्रीय कलाकार भी विपक्षी प्रचार को मजबूती दे रहे हैं। यह साफ दिख रहा है कि कलाकार सिर्फ वोट माँगने नहीं आए — बल्कि अपनी कला के ज़रिए जनता की भावनाएँ जगाने आए हैं। और यह भावनाएँ अक्सर मतपेटी में अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं।

बिहार में भोजपुरी कलाकारों की यह चुनावी सक्रियता एक गहरे संदेश के साथ आई है। दशकों से बिहार को पलायन, गरीबी, बेरोजगारी और असमान अवसरों के संदर्भ में देखा जाता रहा है। लेकिन जब गीतों के बोल कहते हैं — “माटी को सोना करेंगे, बिहारी को सम्मान देंगे” तो यह सिर्फ स्टेज पर सुनाई जाने वाली लाइन नहीं, बल्कि बिहार की आत्मा से निकली पुकार लगती है। यही वजह है कि इस बार पहचान की राजनीति को सुर और राग की ताकत मिल गई है। यहाँ सभा में खड़ा हर शख्स संभावित वोटर है — और उसकी भावनाएँ अब सियासी प्रभाव का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी हैं।

हालाँकि, इस बदलाव पर सवाल भी उठ रहे हैं। राजनीतिक रणनीतिकारों का एक वर्ग मानता है कि गानों और स्टार पावर के बीच रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई जैसे मुद्दे पिछड़ सकते हैं। लेकिन दलों की दलील है कि

“जे दिल जीत ले, उे वोट जीत ले” यानी भावनाएँ जीतकर नीति की बात भी बाद में कराई जा सकती है। इसीलिए भोजपुरी कलाकार आज सिर्फ प्रचारक नहीं, बल्कि चुनावी ब्रांड एम्बेसडर बन चुके हैं।

बिहार का यह चुनाव सिर्फ राजनीति की लड़ाई नहीं,

संस्कृति, सम्मान और पहचान की जंग भी बन चुका है।

अब देखने वाली बात यह है कि क्या यह सुर-लहरियाँ सीटों में बदलेंगी या सिर्फ तालियों की गड़गड़ाहट बनकर रह जाएँगी? एक बात तय है — बिहार में चुनावी मौसम में भोजपुरी की गूंज सबसे तेज़ सुनाई दे रही है।

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