राष्ट्रीय / राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता/नई दिल्ली | 7 अप्रैल 2026
पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले Special Intensive Revision (SIR) को लेकर सियासी और कानूनी घमासान अपने चरम पर पहुंच गया है। इस विवाद का केंद्र है संविधान का Article 326 of the Constitution of India, जो हर वयस्क नागरिक को मताधिकार का अधिकार देता है। विपक्षी दलों और कई प्रभावित मतदाताओं का आरोप है कि रिवीजन के नाम पर लाखों वैध वोटरों को सूची से बाहर किया जा रहा है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा असर पड़ रहा है। उनका कहना है कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज थे, उन्हें इस तरह हटाना Article 326 की भावना के खिलाफ है।
वहीं चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि उसका कदम पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत उठाया गया है। आयोग का तर्क है कि Article 324 of the Constitution of India उसे चुनावी प्रक्रिया की निगरानी और शुद्धता सुनिश्चित करने का अधिकार देता है। इसी के तहत नागरिकता, आयु, निवास और अन्य पात्रताओं की जांच की जा रही है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में मौजूद डुप्लिकेट, मृतक और संदिग्ध नामों को हटाना लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में जरूरी कदम है।
आंकड़ों के अनुसार, SIR प्रक्रिया के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7.04 करोड़ रह गई है, जो पहले के 7.66 करोड़ के मुकाबले करीब 8 प्रतिशत कम है। इस दौरान लाखों नामों को “logical discrepancies” की श्रेणी में डालकर जांच के दायरे में रखा गया है। कई मामलों में adjudication जारी है और बड़ी संख्या में क्लेम्स और ऑब्जेक्शन्स दाखिल किए गए हैं। इस पूरे मामले पर Supreme Court of India भी लगातार नजर बनाए हुए है और समय-समय पर सुनवाई कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों और ट्रिब्यूनलों के गठन का निर्देश दिया है, ताकि प्रभावित मतदाताओं को निष्पक्ष सुनवाई मिल सके। कोर्ट ने यह भी कहा है कि प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और किसी भी वास्तविक मतदाता को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालांकि, अदालत ने चुनावी प्रक्रिया को रोकने या रोल फ्रीज करने की मांग को खारिज कर दिया है, जिससे साफ है कि SIR अभियान जारी रहेगा।
राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा और ज्यादा गर्म हो गया है। कई जिलों, खासकर सीमावर्ती और अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में ज्यादा जांच को लेकर सत्तारूढ़ दल ने सवाल उठाए हैं और इसे “साजिश” करार दिया है। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि हर नाम को नोटिस और जांच के बाद ही हटाया जा रहा है। Representation of the People Act, 1950 के तहत Electoral Registration Officer (ERO) को जांच का अधिकार है, इसलिए पुराना पंजीकरण स्थायी मान्यता की गारंटी नहीं देता।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच आम मतदाताओं में भ्रम और चिंता का माहौल है। कई लोग जिनके नाम पहले सूची में थे, अब उन्हें ड्राफ्ट रोल में नहीं पा रहे हैं और उन्हें दोबारा Form-6 भरकर आवेदन करना पड़ रहा है। चुनाव आयोग ने supplementary lists जारी करना शुरू कर दिया है, जिनमें सत्यापन के बाद नाम जोड़े जा रहे हैं।
यह विवाद साफ तौर पर दो संवैधानिक पहलुओं के बीच संतुलन का मामला बन गया है—एक तरफ Article 326 of the Constitution of India के तहत मताधिकार की गारंटी, और दूसरी तरफ Election Commission of India का कर्तव्य कि वह केवल योग्य मतदाताओं को सूची में शामिल करे। यह प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ लागू किया जाता है। फिलहाल अदालत, राजनीतिक दल और जनता—तीनों की नजर इस पूरे मामले पर टिकी हुई है।




