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बंगाल में SIR का महासंकट—BLO पस्त, स्कूल ठप, वोटर परेशान

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साजिद अली । कोलकाता 3 दिसंबर 2025

स्कूलों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया धीरे-धीरे एक बड़े प्रशासनिक संकट का रूप ले चुकी है। राज्य भर में करीब 80,000 शिक्षकों और सहायक शिक्षकों को अचानक बीएलओ (Booth Level Officer) की ड्यूटी सौंप दी गई, जिससे स्कूलों में नियमित पढ़ाई-लिखाई लगभग ठप पड़ गई। शिक्षकों के मुताबिक, नवंबर–दिसंबर में जब वार्षिक परीक्षाओं की तैयारी और कॉपी जांच की सबसे महत्वपूर्ण अवधि होती है, उसी समय उन्हें SIR के भारी बोझ में धकेल दिया गया है। कई स्कूलों में कक्षाएं तक नहीं चल पा रही हैं क्योंकि पूरा स्टाफ SIR ड्यूटी में लगा हुआ है। इस असंतुलित और जल्दबाज़ी में लागू प्रक्रिया ने न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था बल्कि शिक्षक समुदाय दोनों को गहरे तनाव में डाल दिया है।

समय-सीमा इतनी कम कि गलतियाँ तय

बीएलओ लगातार शिकायत कर रहे हैं कि SIR की प्रक्रिया के लिए न तो उन्हें समुचित प्रशिक्षण दिया गया, न ही काम को आसान बनाने वाले डिजिटल साधन उपलब्ध कराए गए। अधिकांश बीएलओ के पास न लैपटॉप है, न स्थिर इंटरनेट कनेक्शन, न तकनीकी टीम का सहारा। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने हजारों फॉर्म डिजिटल रूप में अपलोड करने का भारी काम उन पर थोप दिया है।

कई बीएलओ बताते हैं कि रात-रात भर जागकर PDF सूचियों में नाम खोजने, फॉर्म भरने और अपलोड करने का काम करना पड़ रहा है, क्योंकि समय-सीमा बेहद कम रखी गई है।

इस दौरान होने वाली किसी भी त्रुटि पर कार्रवाई का डर अलग से सता रहा है। कई बीएलओ खुलकर कह रहे हैं कि “यह प्रक्रिया प्रशासनिक अनुशासन नहीं, प्रशासनिक उत्पीड़न जैसा महसूस हो रही है।” बीएलओ की मौतों और आत्महत्या जैसी घटनाओं के बाद समय-सीमा एक सप्ताह बढ़ाई गई, लेकिन बीएलओ संगठन का कहना है कि इतनी भारी अव्यवस्था के बीच यह राहत “ऊंट के मुँह में जीरा” जैसी है।

 नाम खोजने में हो रही भीषण मुश्किलें

पूरा SIR अभियान 2002 की पुरानी मतदाता सूची पर आधारित है, जो लाखों त्रुटियों से भरी हुई है। वोटरों के नाम क्रमवार नहीं, कई जगह नाम गायब, कई जगह पूरे परिवारों का एक ही EPIC नंबर, हजारों लोगों के नाम गलत जिले या गलत विधानसभा क्षेत्र में, और कई समुदायों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं। इस पूरी प्रक्रिया ने बीएलओ और वोटर दोनों को कठोर परेशानी में डाल दिया है।

एक महिला बीएलओ के मुताबिक, उनके वार्ड में 1,800 वोटर हैं जिनमें से करीब 200 का कोई पता नहीं चल रहा। कई वोटर बताते हैं कि 2002 में वे किसी दूसरे जिले में रहते थे, और अब कोलकाता या दूसरे शहर में बस चुके हैं—लेकिन पुरानी लिस्ट से उनका नाम मिलाना लगभग असंभव है। PDF आधारित डेटाबेस में नाम खोजने का विकल्प सर्च-फ्रेंडली नहीं होने से दिक्कत कई गुना बढ़ गई है। विशेषज्ञ भी पूछ रहे हैं कि जब तकनीक उपलब्ध है, तो EPIC नंबर आधारित आधुनिक सर्च सिस्टम क्यों नहीं बनाया गया?

बीएलओ की मानवीय त्रासदियाँ

SIR प्रक्रिया का दबाव इतना भयावह साबित हो रहा है कि कई बीएलओ अपने व्यक्तिगत दुखों में भी काम पर लौटने को मजबूर हैं। कूचबिहार के बीएलओ पॉलभ गांगुली इसका सबसे मार्मिक उदाहरण हैं। पिता की चिता को आग देने के अगले दिन उन्हें 1,211 वोटरों की जिम्मेदारी निभाने के लिए ड्यूटी पर लौटना पड़ा। वे बताते हैं कि परिवार का शोक, घर की जिम्मेदारियाँ, और SIR का भारी बोझ—इन सबके बीच मानसिक संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। ऐसी कहानियाँ राज्य में अकेली नहीं हैं। कई शिक्षकों ने बताया कि वे दबाव में हैं, नींद नहीं मिल रही, स्वास्थ्य बिगड़ रहा है और मानसिक तनाव चरम पर है।

ममता से लेकर बीजेपी, CPM, कांग्रेस हमलावर

SIR की प्रक्रिया अब प्रशासनिक मुद्दा नहीं, पूरा राजनीतिक विवाद बन गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार चुनाव आयोग को पत्र लिखकर शिक्षकों पर अत्यधिक बोझ का मुद्दा उठाया और उनसे आत्महत्या जैसे कदम न उठाने की अपील की। दूसरी ओर बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने भी इस प्रक्रिया की बदइंतजामी को उजागर करते हुए आयोग को ज्ञापन सौंपा है। CPM और कांग्रेस दोनों का कहना है कि SIR की पूरी कवायद जल्दबाज़ी, गलत योजना और बिना आधार वाली है, जिससे राज्य में भ्रम और तनाव फैल रहा है। विशेषज्ञ आशंका जताते हैं कि यह हड़बड़ी चुनाव से ठीक पहले गलत इरादों का संकेत भी हो सकती है।

हाशिए पर रह रहे समूहों के लिए नई मुसीबत

SIR प्रक्रिया उन समुदायों के लिए भी संकट बन गई है जिनके पास स्थायी पहचान दस्तावेज नहीं हैं। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के नाम बदल चुके हैं, परिवारों ने नाता तोड़ दिया है, और जिन दस्तावेजों की आयोग मांग कर रहा है उनमें “ट्रांसजेंडर कार्ड” का कोई उल्लेख तक नहीं। इसी तरह, एशिया के सबसे बड़े रेड-लाइट क्षेत्र, कोलकाता के सोनागाछी की हजारों यौनकर्मी महिलाएँ भी हताश हैं। उनके पास न स्थायी पते हैं, न पहचान दस्तावेज़। अंततः चुनाव आयोग को रेड-लाइट इलाकों में विशेष सहायता शिविर लगाने पड़े, जो दर्शाता है कि योजना जमीन पर लागू करने से पहले कितनी अधूरी थी।

 क्या यह जानबूझकर विवाद बढ़ाने के लिए किया गया?

कई राजनीतिक विश्लेषकों ने SIR प्रक्रिया की मंशा पर सवाल उठाए हैं। विश्लेषक शिखा मुखर्जी के अनुसार, आयोग की गतिविधियों से यह संदेह पैदा हुआ है कि कहीं यह राजनीतिक निर्देशों से प्रेरित कदम तो नहीं। असम में SIR की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल, संगठित और शांतिपूर्ण थी। लेकिन बंगाल में इसे अचानक, अव्यवस्थित और विवादास्पद तरीके से लागू किया गया है। चुनाव के समय से ठीक पहले इस तरह की प्रक्रिया शुरू करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इससे यह संदेह मज़बूत होता है कि यह एक “प्रशासनिक गलती नहीं, प्रशासनिक प्रयोग” है।

प्रशासनिक सुधार कम, अफरातफरी और अव्यवस्था अधिक

पश्चिम बंगाल में SIR का असर सिर्फ मतदाता सूची तक सीमित नहीं है—यह शिक्षा व्यवस्था, सामान्य प्रशासन, शिक्षक समुदाय, हाशिए पर रहने वाले समूहों और लाखों वोटरों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। 80,000 शिक्षकों पर डाली गई अनियोजित ज़िम्मेदारी से लेकर गलत डेटा, तकनीकी अव्यवस्था, भारी समय दबाव, और राजनीतिक आरोप—सब मिलकर यह साबित कर रहे हैं कि SIR ‘विशेष पुनरीक्षण’ के बजाय ‘विशेष संकट’ बन गया है।

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