Home » National » प्रति व्यक्ति टैक्स बोझ पर संग्राम: हर भारतीय देता है 51,000 रुपये टैक्स?

प्रति व्यक्ति टैक्स बोझ पर संग्राम: हर भारतीय देता है 51,000 रुपये टैक्स?

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 16 फरवरी 2026

देश में टैक्स व्यवस्था और आम नागरिक पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर संसद में तीखी बहस छिड़ गई है। चर्चा की शुरुआत उस आंकड़े से हुई जिसमें दावा किया गया कि भारत का हर नागरिक औसतन लगभग 51,000 रुपये सालाना टैक्स देता है। यह प्रश्न संसद में उठाए जाने के बाद सरकार की ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण दिया गया। संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में Nirmala Sitharaman ने स्पष्ट किया कि “प्रति व्यक्ति टैक्स बोझ” का आंकड़ा एक औसत गणना है, जो कुल कर संग्रह को देश की कुल आबादी से विभाजित कर निकाला जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर नागरिक सीधे तौर पर 51,000 रुपये टैक्स चुका रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की कर प्रणाली प्रगतिशील है, जहां आय के अनुसार टैक्स देयता तय होती है और बड़ी आबादी प्रत्यक्ष आयकर के दायरे में ही नहीं आती।

सरकार के अनुसार, देश में टैक्स संग्रह में वृद्धि का मुख्य कारण अर्थव्यवस्था का विस्तार, जीएसटी प्रणाली का बेहतर अनुपालन और डिजिटल भुगतान का बढ़ना है। प्रत्यक्ष कर (इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स) और अप्रत्यक्ष कर (जीएसटी, कस्टम ड्यूटी आदि) को जोड़कर जो कुल राजस्व प्राप्त होता है, उसे जब जनसंख्या से विभाजित किया जाता है तो प्रति व्यक्ति औसत टैक्स राशि निकलती है। यही आंकड़ा लगभग 51,000 रुपये के आसपास बताया जा रहा है।

विपक्ष का तर्क है कि अप्रत्यक्ष करों का असर हर नागरिक पर पड़ता है, चाहे वह आयकर देता हो या नहीं। रोजमर्रा की वस्तुओं, ईंधन, सेवाओं और उपभोग पर लगने वाले जीएसटी के कारण आम आदमी भी कर व्यवस्था का हिस्सा बनता है। वहीं सरकार का कहना है कि जीएसटी प्रणाली में आवश्यक वस्तुओं पर कम दरें रखी गई हैं और टैक्स ढांचे को सरल व पारदर्शी बनाने का लगातार प्रयास किया जा रहा है।

सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि हाल के बजट में मध्यम वर्ग को राहत देने के लिए आयकर स्लैब में बदलाव किए गए हैं। टैक्स बेस बढ़ने का अर्थ यह भी है कि अधिक लोग औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ रहे हैं, जिससे राजस्व बढ़ता है और सरकार को बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर खर्च करने की क्षमता मिलती है।

इस बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि “औसत” और “वास्तविक” टैक्स भुगतान के बीच फर्क को आम जनता तक किस तरह स्पष्ट रूप से पहुंचाया जाए। जहां विपक्ष इसे आम नागरिक पर बढ़ते आर्थिक दबाव के रूप में पेश कर रहा है, वहीं सरकार इसे मजबूत होती अर्थव्यवस्था और व्यापक कर आधार का संकेत बता रही है। आने वाले बजट सत्रों में यह मुद्दा और अधिक विस्तार से उठाए जाने की संभावना है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments