साजिद अली | नई दिल्ली 19 नवंबर 2025
राष्ट्रीय जनता दल की तेज़-तर्रार और बेलाग बोल वाली प्रवक्ता प्रियंका भारती ने समाजवादी नेता आज़म ख़ान के एक इंटरव्यू का वीडियो साझा करते हुए भारतीय राजनीति, न्याय व्यवस्था और सत्ता के दमन पर एक बेहद कड़ा और मार्मिक सवाल उठाया है। सांसद कपिल सिब्बल के मंच पर बोलते हुए आज़म ख़ान का दर्द—जिसे प्रियंका ने अपने शब्दों में भी आगे बढ़ाया—आज के लोकतांत्रिक भारत के उस अंधेरे को उजागर करता है जहाँ सत्ता के खिलाफ खड़े होने वालों का न्याय, उत्पीड़न और जेलों में टूटते परिवारों से तौला जाने लगा है।
प्रियंका भारती ने आज़म ख़ान के उस बयान को साझा किया, जिसमें उन्होंने कहा—“मैंने जेल में सुना था कि एनकाउंटर हो रहे हैं… और जब मुझे मेरे बेटे से अलग किया जाने लगा तो मैंने पूछा कि क्यों? कहाँ ले जा रहे हो? कोई जवाब नहीं मिला। तभी मैंने बेटे को गले लगाकर कहा—ज़िंदा रहे तो बाहर मिलेंगे, वरना ऊपर मिलेंगे।” यह वाक्य सिर्फ एक पिता का दर्द नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा निर्मित भय और असुरक्षा की वह तस्वीर है जिसे लाखों लोग महसूस करते हैं—कुछ बोल नहीं पाते, कुछ डर जाते हैं, और कुछ को बोलने का साहस ही नहीं दिया जाता।
प्रियंका ने लिखा कि आज़म ख़ान की आवाज़ में जो पीड़ा है, वह करोड़ों भारतीयों की पीड़ा है। एक ऐसा दर्द जो न्याय की कोशिश में टूट चुका है, जो सत्ता के दमन को जान चुका है, और जो यह समझ गया है कि लोकतंत्र का झंडा उठाने वालों की कीमत कभी-कभी उनकी जान से भी बड़ी हो जाती है। उन्होंने कहा कि आज़म ख़ान के लिए सबसे आसान रास्ता था—“बीजेपी को हाँ कह देना।” बस! सारी प्रताड़ना खत्म। केस खत्म। जेल खत्म। दमन खत्म। लेकिन आज़म ने “ना” चुना। और इस “ना” की कीमत उन्होंने अपने शरीर, अपनी आत्मा, अपने परिवार और अपने राजनीतिक जीवन से चुकाई।
प्रियंका भारती ने इस तुलना को और स्पष्ट करने के लिए दो तस्वीरें सामने रखीं—एक अनंत सिंह की और एक आज़म ख़ान की। उन्होंने कहा कि बिहार के दुलारचंद यादव हत्या मामले में आरोपी अनंत सिंह की गिरफ्तारी के लिए पुलिस “रिक्वेस्ट” कर रही थी। तस्वीरें आईं कि पुलिस उनका पंखा और ब्रीफ़केस उठाए चल रही है—मानो किसी अपराधी की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि किसी VIP का सम्मान हो रहा हो।
इसके उलट, आज़म ख़ान को दो पैन कार्ड मिलने जैसे मामूली और तकनीकी मामले में 7 साल की सजा सुना दी गई—जबकि इस अपराध के लिए यह कानूनन अधिकतम सज़ा है। यह सिर्फ सज़ा नहीं, बल्कि संदेश है—सत्ताधारी दल के खिलाफ खड़े होने वालों का क्या हश्र होता है।
प्रियंका का कहना है कि यह भारत का दोहरा चेहरा है—
एक तरफ सत्ता के प्रिय अपराधी, जिन्हें फूल-माला मिलती है। दूसरी तरफ सत्ता से टकरा जाने वाला अल्पसंख्यक नेता, जिसे हर मोर्चे पर कुचला जाता है। उन्होंने लिखा—“न्याय के लिए खड़ा रहना आसान नहीं। आसान रास्ता चुनकर इतिहास में खो जाना आसान है, लेकिन कठिन रास्ता चुनकर इतिहास में अमर वही होते हैं।”
प्रियंका भारती का यह बयान सिर्फ राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि मौजूदा सिस्टम की सड़ांध पर सीधा वार है—जहाँ न्याय की जगह पक्षपात, कानून की जगह बदला, और लोकतंत्र की जगह भय का शासन खड़ा हो रहा है। यह खबर सिर्फ आज़म ख़ान की नहीं—यह उन सभी की कहानी है जो सत्ता के झूठ के सामने झुकना नहीं चाहते।




