मेलबॉर्न/ नई दिल्ली 10 नवंबर 2025
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला लेते हुए यह घोषणा कर दी है कि 16 वर्ष से कम उम्र का कोई भी बच्चा अब देश में फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, स्नैपचैट, यूट्यूब, एक्स (पूर्व ट्विटर), रेडिट या किक जैसे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग नहीं कर सकेगा। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने इस फैसले को बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके समग्र विकास की सुरक्षा के लिए “समय की सबसे बड़ी ज़रूरत” बताते हुए घोषणा की कि यह नियम 10 दिसंबर 2025 से पूरे देश में लागू हो जाएगा। इसका मतलब है कि 16 साल से कम उम्र के नाबालिग न तो नया अकाउंट बना सकेंगे, न मौजूदा अकाउंट चला सकेंगे और प्लेटफॉर्म कंपनियों पर यह कानूनी जिम्मेदारी होगी कि वे किसी भी हाल में नाबालिग को प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँचने न दें।
सरकार के अनुसार इस कानून का उद्देश्य बच्चों को सोशल मीडिया पर मौजूद हानिकारक सामग्री, साइबर बुलिंग, अश्लील सामग्री, हिंसक वीडियो, हेट कंटेंट और गलत जानकारी के जाल से बचाना है। प्रधानमंत्री अल्बनीज़ ने कहा कि दुनिया भर के कई प्रमुख अध्ययनों में स्पष्ट रूप से पाया गया है कि सोशल मीडिया का लंबे समय तक उपयोग बच्चों की मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालता है—उनमें चिंता बढ़ती है, अवसाद उभरता है, नींद की कमी होती है और एकाग्रता लगातार घटती जाती है। इसी कारण सरकार अब किसी भी प्रकार की ढिलाई बरतने को तैयार नहीं है। संचार मंत्री मिशेल राउस ने भी दोहराया कि “डिजिटल दुनिया बच्चों को नुकसान पहुँचाने की जगह नहीं हो सकती… सरकार का पहला कर्तव्य उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है।”
इस कानून में सबसे चुनौतीपूर्ण प्रश्न यह था कि आयु सत्यापन कैसे किया जाएगा, क्योंकि दुनिया भर में सोशल मीडिया कंपनियों को नाबालिगों की सही उम्र का पता लगाना मुश्किल होता है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने इस मुद्दे पर दुनिया के लिए एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है। नए नियमों के अनुसार सोशल मीडिया कंपनियों को कई-स्तरीय आयु सत्यापन तकनीकों का उपयोग करना होगा। इसमें शामिल हो सकता है—सरकारी आईडी या किसी आधिकारिक दस्तावेज का प्रस्तुतिकरण, चेहरे की पहचान तकनीक के जरिए उम्र का अनुमान लगाना, आवाज विश्लेषण, और यहां तक कि उपयोगकर्ता के टाइपिंग पैटर्न, शब्द चयन, ब्राउज़िंग शैली और कनेक्शन डेटा के आधार पर अनुमान तैयार करना। संचार मंत्री अनिका वेल्स ने कहा कि हालाँकि ये सभी तकनीकें “100 प्रतिशत सटीक” नहीं होंगी, लेकिन कानून तोड़ने का कोई बहाना नहीं चलेगा। यदि कंपनियां इन उपायों को लागू नहीं करतीं, तो उन्हें भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई झेलनी पड़ेगी।
ऑस्ट्रेलिया का यह फैसला दुनिया भर में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म रेगुलेशन के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है। कई देश पहले ही सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों को समझ चुके हैं, लेकिन किसी बड़े विकसित देश द्वारा 16 वर्ष से कम आयु समूह पर सोशल मीडिया के पूर्ण प्रतिबंध जैसा साहसिक कदम पहली बार देखने को मिला है। यह निर्णय डिजिटल कंपनियों के लिए एक बड़ा संदेश है—अब बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे पर समझौता नहीं होगा। इसके बाद माना जा रहा है कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूरोपीय संघ भी कठोर नियमों की दिशा में बढ़ सकते हैं।
वहीं कुछ विशेषज्ञ इस कानून पर बहस भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध से बच्चों की डिजिटल साक्षरता, रचनात्मकता और इंटरनेट के सकारात्मक उपयोग पर असर पड़ सकता है। लेकिन सरकार का मत स्पष्ट है—पहले सुरक्षा, फिर स्वतंत्रता। जब बच्चों की मानसिक और भावनात्मक सेहत का सवाल हो, तब किसी प्रकार का जोखिम स्वीकार नहीं किया जा सकता। सरकार का यह भी कहना है कि यह कानून अभिभावकों के लिए भी राहत लेकर आएगा, क्योंकि लगातार स्क्रीन टाइम, ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया एडिक्शन और साइबरबुलिंग जैसी समस्याएं अब घर-घर की चिंता बन चुकी थीं।
10 दिसंबर से लागू होने वाला यह नया डिजिटल अध्याय न सिर्फ ऑस्ट्रेलिया बल्कि वैश्विक इंटरनेट प्लेटफ़ॉर्मों की दिशा भी तय करेगा। अब दुनिया की नज़र इस पर होगी कि ऑस्ट्रेलिया का यह प्रयोग कितना सफल होता है, कंपनियां कानून का पालन किस हद तक कर पाती हैं और क्या यह कदम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य में वास्तविक सुधार लाता है। यह फैसला डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा की लड़ाई में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।




