बेंगलुरु, 31 अक्टूबर | विशेष संवाददाता
देश के लोकतंत्र की जड़ें अब सचमुच हिल चुकी हैं। मतदाता सूची से नाम गायब करने की साजिश अब सिर्फ अफवाह नहीं — बल्कि कर्नाटक पुलिस की SIT की जांच से सामने आया हुआ कड़वा सच है। पूर्व बीजेपी विधायक सुबHASH गुट्टेदार के घर से बरामद CCTV फुटेज और DVR इस बात का प्रमाण हैं कि “वोट चोरी” की गंदी राजनीति किस स्तर तक जा चुकी है।
SIT की जांच में साफ हुआ है कि गुट्टेदार और उनके सहयोगियों ने 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले आलंद क्षेत्र की वोटर लिस्ट में से नाम हटाने की साजिश रची। CCTV में उनके घर के बाहर वोटर लिस्ट जैसे दस्तावेजों को जलाने और मिटाने की कोशिशें दर्ज हैं।
सरकारी अभियोजक ने अदालत में खुलासा किया कि DVR से प्राप्त वीडियो में गुट्टेदार के घर के बाहर वोटर लिस्ट नष्ट करने का स्पष्ट सबूत मिला है। SIT ने गुट्टेदार, उनके बेटे हर्षा गुट्टेदार और सहयोगी टिप्पेरुद्रा की अग्रिम जमानत का जोरदार विरोध किया।
लेकिन सवाल यह है — आखिर चुनाव आयोग (ECI) और अदालतें चुप क्यों हैं? देश की आत्मा पर हमला करने वाला यह मामला किसी फ्रंट पेज पर नहीं, अखबारों के अंदरूनी पन्नों पर दबा दिया गया। क्यों? क्योंकि हर कोई जानता है — चुनाव आयोग और सत्ता में बैठी बीजेपी एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं।
SIT की रिपोर्ट बताती है कि 6,018 मतदाताओं के नाम डिलीट करने के लिए आवेदन किए गए, जिनमें से केवल 24 ही सही पाए गए। यानी हजारों लोगों का वोट छीनने की साजिश योजनाबद्ध ढंग से रची गई थी। और जब कोई सवाल उठाता है, तो बीजेपी तुरंत चुनाव आयोग के बचाव में उतर आती है। क्या यही लोकतंत्र है?
गुट्टेदार, जो चार बार विधायक रह चुके हैं, अब इसे “राजनीतिक षड्यंत्र” बता रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि सत्ता के गलियारों में वर्षों से वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों का खेल चल रहा है। लोकतंत्र के कातिल अब संविधान की आड़ में बैठे हैं।
अब वक्त आ गया है कि देश की जनता सड़कों पर उतरे, वोट चोरी के खिलाफ आवाज उठाए और सच्चे लोकतंत्र की बहाली के लिए सत्याग्रह शुरू करे। अगर वोट की पवित्रता खत्म हुई — तो फिर संसद, संविधान और स्वतंत्र भारत — सब सिर्फ नाम के रह जाएंगे।




