सुमन कुमार | नई दिल्ली 29 दिसंबर 2025
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और अरावली रेंज की सेंट्रल पर्यावरण मंत्रालय की परिभाषा को स्वीकार करने के अपने पहले के फैसले (जो 20 नवंबर को जारी किया गया था) को “स्थगित” कर दिया है। जिस अरावली की लो डेंसिटी पर्वत श्रृंखलाओं को उद्योगपतियों के नजर किए जाने की योजनाएं बनाई जा रही थी उस पर फिलहाल बड़ी रोक लग गई है। नेचुरल चीजों का संरक्षण और देश के लिए पर्यावरण कितना अहम है, सर्वोच्च न्यायालय ने इसे तरजीह दी है। नरेंद्र मोदी सरकार अपने उद्योगपति दोस्तों के लिए पहाड़ों पर्वतों और खनन नियमों को तोड़ मरोड़ कर फायदा पहुंचाना चाहती थी। मोदी के सपनों को पंख लगने से पहले न्यायालय ने अपना बुलडोजर चलाकर योजना को धराशाई कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों को खनन, रियल एस्टेट और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए दिए जाने पर अस्थाई तौर पर रोक लगाई है। कांग्रेस ने कोर्ट के फैसले का भरपूर स्वागत करते हुए पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का इस्तीफा मांगा है। जयराम रमेश ने कहा है कि अरावली की लड़ाई जारी रहेगी।
अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा निर्देशों का कांग्रेस ने स्वागत किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा है कि मोदी सरकार अरावली की परिभाषा बदलकर उसे खनन, रियल एस्टेट और दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए खोलना चाहती थी, लेकिन अब इस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने कहा, “आज सुप्रीम कोर्ट में बिल्कुल दूध का दूध पानी का पानी साबित हो गया कुछ दिनों से पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव मुझ पर आरोप लगा रहे थे कि मैं और अशोक गहलोत जी अरावली को लेकर राजनीति कर रहे हैं…. अरावली दिल्ली, हरियाणा,राजस्थान और गुजरात के लिए और देश के लिए जरूरी है लेकिन ये लोग इसे बिगाड़ने में लगे हुए थे। इनका (बीजेपी) बचाने का कोई इरादा नहीं था बेचने का था। अभी हम जितने प्रदूषण में जी रहे हैं इससे और ज्यादा करना चाहते थे तो हमने ये मुद्दे उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पर और विचार और अध्ययन होगा…भूपेंद्र यादव को इस्तीफा देना चाहिए। हमारी सिर्फ यही मांग है क्योंकि उन्होंने हम पर गंभीर आरोप लगाए। आज सुप्रीम कोर्ट में साबित हो गया कि वो आरोप गलत था…हमें अरावली में हरियाली वापस लाना है। ये जीवन के लिए जरूरी है और हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं।”
जयराम रमेश ने साफ शब्दों में कहा कि अरावली की नई परिभाषा का विरोध पहले से ही फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी और कोर्ट के अमीकस क्यूरी भी कर चुके हैं। ऐसे में अब इस पूरे मामले को गहराई से दोबारा जांचने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि फिलहाल यह एक अस्थायी राहत है, लेकिन अरावली को बचाने की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि सरकार की मंशा अरावली क्षेत्र को धीरे-धीरे खनन और बड़े निर्माण कार्यों के हवाले करने की है, जिसका पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि आज का सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक “उम्मीद की हल्की सी रोशनी” जरूर दिखाता है, लेकिन इसके लिए लगातार और मजबूती से विरोध जारी रखना होगा।
जयराम रमेश ने इस फैसले के बाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री से तुरंत इस्तीफे की मांग भी की। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मंत्री द्वारा अरावली की परिभाषा बदलने के पक्ष में दिए गए सभी तर्कों को खारिज करता है। कांग्रेस के मुताबिक, यह फैसला साफ संकेत देता है कि सरकार की नीति पर्यावरण के बजाय मुनाफे को प्राथमिकता दे रही थी। कांग्रेस ने इस फैसले को अरावली और पर्यावरण संरक्षण के लिए अहम बताया है और कहा है कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर जनता की आवाज और तेज़ होगी।





