राजेश कुमार । भोपाल 26 नवंबर 2025
मध्य प्रदेश में मतदाता सूची से जुड़े सबसे संवेदनशील पद—BLO असिस्टेंट—की नियुक्तियों में बड़ा खुलासा होने के बाद अब राजनीतिक गलियारों में तूफ़ान आ गया है। सामने आया है कि जिन लोगों को घर–घर जाकर मतदाता सत्यापन, नाम जोड़ने–काटने और मतदान सूची तैयार करने जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य सौंपे गए थे, उनमें बड़ी संख्या बीजेपी और आरएसएस से जुड़े व्यक्तियों की थी। यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला है, बल्कि विपक्ष का आरोप है कि यह “बीजेपी और चुनाव आयोग की मिलीभगत का एक और ताजा नमूना” है, जिसके ज़रिए मतदाता सूची को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ज़िले के जिलाधिकारी (DM) ने खुद स्वीकार किया है कि यह गलती हुई है और राजनीतिक रूप से जुड़े लोगों का नाम नियुक्ति सूची में आ गया है। DM ने इसे “अनजाने में हुई त्रुटि” बताया, लेकिन सवाल यह है कि देश की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया—मतदाता सूची—की तैयारी में ऐसी ‘अनजानी’ गलती आखिर कैसे संभव है? और क्या यह केवल एक जिला ही है, या राज्यभर में ऐसे कई नाम चुपचाप नियुक्त कर दिए गए?
राजनीतिक विशेषज्ञों और विपक्षी दलों का कहना है कि यह कोई साधारण गलती नहीं है, बल्कि मतदाता सूची पर कब्जा करने की एक गहरी रणनीति का हिस्सा है। BLO और BLO असिस्टेंट वही लोग होते हैं जो यह तय करते हैं कि कौन वोटर सूची में रहेगा और कौन नहीं। यह उनकी रिपोर्ट ही तय करती है कि किसके नाम काटे जाएंगे, किसके जोड़े जाएंगे और किस क्षेत्र में मतदाता संख्या कैसे बदलेगी। ऐसे में किसी पार्टी से जुड़े लोगों की नियुक्ति सीधे–सीधे लोकतंत्र की रीढ़ पर हमला है। विपक्ष पूरे मामले को “चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच कामन इंटरेस्ट ऑपरेशन” बता रहा है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को पार्टी के अनुकूल बनाना है।
स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों का कहना है कि नियुक्त किए गए कई असिस्टेंट खुले तौर पर बीजेपी–आरएसएस से जुड़े रहे हैं—किसी ने चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया, किसी ने स्थानीय शाखा में पद संभाला, तो कोई पार्टी कार्यक्रमों में मंच पर देखा गया। फिर भी उनकी नियुक्ति कैसे मंजूर हुई? क्या दस्तावेज़ों की जांच नहीं हुई, या जानबूझकर अनदेखा किया गया?
पूरे देश में Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर पहले ही व्यापक आलोचना हो रही है। BLO स्तर पर इस तरह की राजनीतिक नियुक्तियाँ सामने आने से SIR की विश्वसनीयता पूरी तरह संदिग्ध हो गई है। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची को प्रभावित करने की कोशिशें अब बूथ स्तर तक पहुँच चुकी हैं, और मध्य प्रदेश का यह मामला सिर्फ “बर्फ की चोटी” है—नीचे इससे कहीं बड़ा घोटाला दफन हो सकता है।
अब सवाल यह है कि चुनाव आयोग इस गंभीर आरोप पर क्या करेगा? क्या राज्य में सभी BLO और BLO असिस्टेंट नियुक्तियों की पूरी समीक्षा होगी? क्या बीजेपी और प्रशासन के बीच किसी तरह के समन्वय की जांच होगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या मतदाता सूची जैसी संवेदनशील प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जा सकेगा?
मध्य प्रदेश का यह खुलासा केवल एक गलती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे पर खड़े सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ—मतदाता के अधिकार—पर सीधा हमला है। और अगर सच में यह मिलीभगत है, तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक संकेत है।




