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मणिपुर में दो साल से जारी हिंसा के बीच आखिरकार जागा संघ, मोहन भागवत करेंगे संवेदनशील दौरा

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आलोक कुमार | नई दिल्ली 19 नवंबर 2025

मणिपुर में पिछले दो वर्षों से चली आ रही जातीय और सांप्रदायिक हिंसा ने राज्य की सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संरचना को गहराई से झकझोर दिया है। सैकड़ों लोग बेघर हो चुके हैं, हजारों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं और समुदायों के बीच अविश्वास की खाई लगातार चौड़ी होती गई है। इन सबके बीच अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता को लेकर एक बड़ा संकेत सामने आया है। लंबे समय तक चुप्पी और सीमित हस्तक्षेप के बाद RSS प्रमुख मोहन भागवत पहली बार मणिपुर का दौरा करने जा रहे हैं। यह दौरा सिर्फ एक औपचारिक यात्रा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उस बड़े विमर्श की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है, जिसे पिछले दो वर्षों में बार-बार उठाया गया लेकिन धरातल पर कोई ठोस पहल नहीं दिखी। भागवत का यह दौरा साफ संकेत देता है कि संघ अब स्थिति को समझने, पीड़ित समाज से सीधा संवाद करने और जमीन पर शांति बहाली की प्रक्रिया में अपनी भूमिका तय करने के लिए आगे आ रहा है।

मोहन भागवत के इस संभावित दौरे को लेकर राज्य में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। सूत्र बताते हैं कि वे हिंसा प्रभावित इलाकों, राहत शिविरों और उन क्षेत्रों का भी दौरा कर सकते हैं जहाँ समुदायों के बीच संवाद पूरी तरह टूट चुका है। RSS प्रमुख स्थानीय समाज के प्रतिनिधियों, धार्मिक संगठनों, कूकी-मीतैई समुदायों के नेताओं, और अपने स्वयंसेवकों से मिलकर स्थिति की गहराई को समझने का प्रयास करेंगे। पिछले दो वर्षों में एक के बाद एक हमलों ने सामाजिक भरोसे को बुरी तरह तोड़ दिया है—व्यापार, स्कूल, किसान समुदाय, महिलाओं की सुरक्षा, और कानून व्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दे लगातार संकट में रहे हैं। भागवत का फील्ड दौरा इन चिंताओं को सीधे समझने का प्रयास होगा और संकेत मिलते हैं कि वे केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन से भी इस स्थिति पर विस्तृत चर्चा कर सकते हैं।

सवाल अब यह भी उठ रहा है कि क्या इस दौरे से मणिपुर में शांति बहाली की कोई ठोस शुरुआत होगी, या यह सिर्फ राजनीतिक दबावों और आलोचनाओं के बीच लिया गया देर से आया कदम है। दो वर्षों की हिंसा के दौरान सिविल सोसाइटी, मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने बार-बार यह मुद्दा उठाया था कि राज्य को सिर्फ सैन्य उपायों से नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, विश्वास बहाली और राजनीतिक सहमति से स्थिर किया जा सकता है। संघ का शीर्ष नेतृत्व अब जब मैदान में उतर रहा है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि भागवत किस तरह की दिशा और प्राथमिकताएँ तय करते हैं। मणिपुर के लोग अब भी भय, अविश्वास और थकान से घिरे हुए हैं—ऐसे में संघ के प्रमुख का यह दौरा उनके लिए उम्मीद भी जगाता है और कई सवाल भी छोड़ता है कि क्या वाकई अब बदलाव की शुरुआत होने जा रही है या मणिपुर को और इंतज़ार करना पड़ेगा।

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